

धामी-हरदा के बदले सुरों में छिपे सियासी संकेत!
मुख्यमंत्री ने कहा- रावत सम्मानित नेता, हरदा ने बताया धामी का बड़प्पन, हरिद्वार से चुनावी इच्छा ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो हरिद्वार।
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में जब बयान अक्सर वार-पलटवार का हथियार बनते हैं, उसी दौर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच सार्वजनिक संवाद का बदला अंदाज राजनीतिक संकेतों के लिहाज से चर्चा में है। धामी ने रावत को सम्मानित नेता बताया तो हरदा ने मुख्यमंत्री की सराहना को शिष्टाचार, सौम्यता और बड़प्पन करार दिया।
हरकी पैड़ी पर गंगा पूजन के बाद रावत ने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और शिष्टाचार लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा है। दूसरी ओर धामी ने रावत के लंबे सार्वजनिक जीवन और समाजसेवा का उल्लेख करते हुए उनके प्रति सम्मान जताया।
सम्मान के बीच चुनावी संदेश!
इस संवाद का दूसरा पहलू ज्यादा राजनीतिक है। रावत ने हरिद्वार जिले की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा सार्वजनिक कर दी है। इससे पहले भी उन्होंने हरिद्वार के साथ अपने पुराने राजनीतिक जुड़ाव और दोबारा प्रतिनिधित्व की इच्छा का जिक्र किया था। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट रखा है कि अंतिम निर्णय समय, परिस्थितियों, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए होगा।
यही वजह है कि रावत का बयान सीधे तौर पर उम्मीदवारी की घोषणा नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी राजनीति में अपनी संभावित भूमिका का संकेत माना जा रहा है। हरिद्वार उनके लिए नया राजनीतिक मैदान भी नहीं है, वह 2009 से 2014 तक इस क्षेत्र का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
धामी का जवाब भी राजनीतिक रूप से अहम!
रावत की संभावित चुनावी वापसी पर धामी का सम्मानजनक जवाब भी ध्यान खींचता है। मुख्यमंत्री ने उन्हें सम्मानित नेता बताते हुए उनके सार्वजनिक जीवन की सराहना की है। यह बयान राजनीतिक समर्थन या चुनावी समीकरण का संकेत नहीं है, लेकिन दोनों ध्रुवों के बीच व्यक्तिगत सम्मान की भाषा जरूर सामने लाता है।
दरअसल, 2027 की ओर बढ़ती उत्तराखंड की राजनीति में हरिद्वार एक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र है। ऐसे में रावत की संभावित वापसी की चर्चा स्वाभाविक रूप से कांग्रेस की रणनीति, स्थानीय दावेदारियों और भाजपा के चुनावी समीकरणों से जुड़ती है। फिलहाल इनमें से किसी संभावित समीकरण पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
राजनीति में प्रतिद्वंद्विता कायम है, लेकिन संवाद का लहजा बदला हुआ है। धामी का सम्मान और हरदा की तारीफ एक तरफ, वहीं हरिद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा दूसरी तरफ—इन दोनों घटनाओं ने 2027 से पहले उत्तराखंड की सियासत में एक नया राजनीतिक अध्याय जरूर खोल दिया है।
