*उत्तराखंड में ‘जंगल का ऑपरेशन’!
वन्यजीवों की नसबंदी से थमेगा आतंक? धामी सरकार का चौंकाने वाला फैसला!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो
देहरादून।
लगातार हो रहे वन्यजीवों के हमलों से पूरा उत्तराखंड कराह रहा है। पहाड़ हों या मैदानी इलाके—अखबारों के पन्ने रोज़ गुलदार, भालू, हाथी और बंदरों के हमलों की खबरों से भरे रहते हैं। कहीं किसान खेत छोड़ने को मजबूर हैं तो कहीं लोगों की जान जा रही है। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मानव–वन्यजीव संघर्ष को लेकर ऐसा फैसला लिया है, जिसने सभी को चौंका दिया है।
जहां एक ओर वन विभाग के पास जानवरों को बेहोश करने तक के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, भालू पकड़ने के लिए पिंजरे नहीं हैं और आदमखोर गुलदारों को मारने के लिए निजी शिकारियों को हायर किया जा रहा है—वहीं अब सरकार ने जंगली जानवरों की नसबंदी (बंध्याकरण) का प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है।
मुख्यमंत्री धामी ने साफ कहा कि राज्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष के मामलों को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा। इसके लिए सोलर फेंसिंग और सेंसर बेस्ड अलर्ट सिस्टम लगाए जाएंगे, ताकि गांवों और खेतों को जंगली जानवरों से सुरक्षित किया जा सके।
इतना ही नहीं, लंगूर, बंदर, सुअर, भालू और अन्य वन्यजीवों की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के लिए हर जनपद में आधुनिक वन्यजीव बंध्याकरण (नसबंदी) केंद्र खोले जाएंगे। साथ ही मानव–वन्यजीव संघर्ष में पकड़े गए जानवरों के लिए रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन सेंटर भी बनाए जाएंगे। पर्वतीय क्षेत्रों में इसके लिए न्यूनतम 10 नाली और मैदानी क्षेत्रों में 1 एकड़ भूमि आरक्षित की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने यह भी ऐलान किया कि इन सभी योजनाओं को शीर्ष प्राथमिकता में रखा गया है और दो सप्ताह के भीतर ठोस रणनीति तैयार कर अमल में लाई जाएगी। वन विभाग को जाल, पिंजरे, ट्रेंकुलाइजेशन गन जैसे जरूरी संसाधनों के लिए ₹5 करोड़ की अतिरिक्त धनराशि दी जाएगी।
मानव–वन्यजीव संघर्ष की त्वरित रोकथाम के लिए केंद्र सरकार के वन्यजीव अधिनियम में मौजूद प्रावधानों के तहत अधिकारों का विकेंद्रीकरण कर रेंजर स्तर के अधिकारियों को भी सशक्त किया जाएगा। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री की केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से भी बातचीत हो चुकी है।
अब सवाल यही है—
👉 क्या नसबंदी से थमेगा जंगल का आतंक?
👉 क्या यह फैसला पहाड़ से हो रहे पलायन पर भी लगाम लगा पाएगा?
उत्तराखंड की जनता की निगाहें अब धामी सरकार के इस बड़े और विवादित फैसले पर टिकी हैं।
