हमारी सांस्कृतिक विरासत: कुमाऊं की विशिष्ट परंपरा ‘भिटौली’
दर्पण न्यूज 24/7 | विशेष लेख
(साभार: वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे)
कुमाऊं अंचल अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां का जनजीवन प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है और अधिकांश लोक परंपराएं ऋतुओं के परिवर्तन के साथ जीवंत होती हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत भावुक, आत्मीय और रिश्तों को संजोने वाली परंपरा है— भिटौली।
*वसंत और भावनाओं का संगम*
वसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा जाता है। यह ऋतु न केवल प्रकृति में नवचेतना का संचार करती है, बल्कि मानव मन में भी उमंग, उल्लास और अपनत्व की भावना जगाती है। ठंड के बाद जैसे ही प्रकृति हरियाली, कोंपलों और रंग-बिरंगे फूलों से सजती है, वैसे ही रिश्तों की मिठास भी नए सिरे से जीवंत हो उठती है।
सरसों के पीले फूल, बुरांश की लालिमा, काफल के फल और पंछियों की मधुर चहचहाहट—यह सब मिलकर कुमाऊं में भिटौली के आगमन का संकेत देते हैं।
* भिटौली: रिश्तों की मिठास*
भिटौली केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि बेटी-बहनों के प्रति प्रेम, सम्मान और अपनत्व का प्रतीक है। चैत्र मास में जब विवाहिता बेटियां अपने मायके से दूर ससुराल में होती हैं, तब उनके पिता और भाई उन्हें भिटौली देने पहुंचते हैं।
भिटौली का अर्थ है—भेंट, उपहार और हालचाल। इसमें भाई या पिता अपनी बेटी-बहन के लिए वस्त्र, मिठाई, स्थानीय पकवान और सामर्थ्य अनुसार उपहार लेकर जाते हैं। पहले इन उपहारों को ‘छापरी’ (टोकरी) में सजाकर ले जाया जाता था।
* परंपरा के पीछे की संवेदना*
पहाड़ों में एक समय ऐसा था जब यातायात और संचार के साधन बेहद सीमित थे। बाल्यावस्था में विवाह होने के कारण बेटियां दूर-दराज के गांवों में चली जाती थीं। ऐसे में उनसे मिलना दुर्लभ होता था। वसंत के आगमन पर जब प्रकृति खिल उठती थी, तब माता-पिता और भाई के मन में अपनी बेटी-बहन से मिलने की तीव्र इच्छा जागृत होती थी। इसी भाव से भिटौली परंपरा का जन्म हुआ।
* लोकगीतों में झलकता दर्द और अपनापन*
भिटौली की परंपरा कुमाऊं के लोकगीतों में गहराई से रची-बसी है। ये गीत बहनों की प्रतीक्षा, प्रेम और भावनाओं को मार्मिक रूप से व्यक्त करते हैं—
“चैत बैशाग भिटाइ मैनां,
लिए भाया चाइ रौली बैना…”
इन गीतों में एक बहन की अपने भाई के प्रति प्रतीक्षा, स्नेह और मिलन की आकांक्षा झलकती है। घुघुती पक्षी की कुहुक भी उसे अपने मायके की याद दिलाती है और उसका मन भावुक हो उठता है।
*आधुनिकता के बीच परंपरा का महत्व*
आज भले ही दुनिया आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही हो और संचार के साधन सुलभ हो गए हों, लेकिन भिटौली जैसी परंपराएं आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और रिश्तों की अहमियत का एहसास कराती है।
* विरासत जो हर साल लौटती है*
भिटौली केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भावनाओं का उत्सव है—एक ऐसा अवसर जब दूरियां मिटती हैं और रिश्ते फिर से जीवंत हो उठते हैं। हर साल वसंत के साथ यह परंपरा लौटती है और अपने साथ लाती है प्रेम, अपनापन और सांस्कृतिक गर्व।
जब तक ऋतुएं आती रहेंगी, तब तक भिटौली भी यूं ही हर साल हमारे जीवन में रिश्तों की मिठास घोलती रहेगी।
