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तबादलों की फाइलों में अटक गई पहाड़ की सेहत, अस्पतालों में डॉक्टरों का टोटा!
अल्मोड़ा में दो माह से फिजिशियन नहीं, मरीजों की सांसों पर भारी पड़ रही सरकार की तबादला नीति,
जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी-पीएचसी तक विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, इलाज के लिए रेफर होने को मजबूर पहाड़ की जनता!

दर्पण न्यूज 24/7 अल्मोड़ा।

पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के कठघरे में है। पंडित हर गोविंद पंत जिला चिकित्सालय, अल्मोड़ा में करीब दो माह से फिजिशियन चिकित्सक का पद खाली पड़ा है। विशेषज्ञ चिकित्सक के अभाव में गंभीर और जटिल बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को उपचार और परामर्श के लिए दूसरे अस्पतालों की दौड़ लगानी पड़ रही है। ऑपरेशन जैसी सेवाएं भी प्रभावित होने का दावा किया जा रहा है।
मामला सिर्फ अल्मोड़ा के एक अस्पताल का नहीं है। जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होती जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि सरकार की तबादला नीति का खामियाजा आखिर कब तक मरीज भुगतते रहेंगे?
सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट संजय कुमार पाण्डे ने इस मामले को शासन के शीर्ष स्तर तक पहुंचाते हुए राज्यपाल, मुख्य सचिव और महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को पत्र भेजकर जिला अस्पताल में रिक्त दोनों फिजिशियन पदों पर तत्काल नियुक्ति की मांग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई है।
तबादला हुआ, लेकिन विकल्प की व्यवस्था नहीं
जिला चिकित्सालय में तैनात फिजिशियन डॉ. हरीश आर्य के स्थानांतरण के बाद करीब दो माह बीत जाने के बावजूद उनके स्थान पर नए फिजिशियन की तैनाती नहीं हो सकी है। सवाल यह है कि यदि किसी अस्पताल से विशेषज्ञ चिकित्सक का तबादला किया जाता है तो क्या शासन और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसके स्थान पर तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए?
एक डॉक्टर के स्थानांतरण के बाद पद खाली छोड़ देना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मरीजों की जिंदगी और स्वास्थ्य पर पड़ता है।
छह किलोमीटर दूर मेडिकल कॉलेज का सहारा
फिजिशियन की कमी का असर जिला अस्पताल की चिकित्सा सेवाओं पर पड़ रहा है। गंभीर मरीजों और ऑपरेशन से जुड़े मामलों को विशेषज्ञ परामर्श के लिए करीब छह किलोमीटर दूर मेडिकल कॉलेज जाने की मजबूरी बताई जा रही है।
दूसरी ओर मेडिकल कॉलेज में भी सीमित संख्या में फिजिशियन होने के कारण मरीजों का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में एक अस्पताल की कमी दूसरे अस्पताल पर बोझ बढ़ा रही है और अंततः परेशान हो रहा है आम मरीज।
डीएम और सीएमओ से मुलाकात भी बेअसर
संजय पाण्डे के मुताबिक उन्होंने जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्साधिकारी से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर जिला चिकित्सालय में फिजिशियन की कमी का मुद्दा उठाया था। अधिकारियों के संज्ञान में मामला लाए जाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकलने पर अब शासन स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की गई है।
उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो स्थानीय जनता को साथ लेकर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
सवाल सिर्फ अल्मोड़ा का नहीं, पूरे पहाड़ का है
अल्मोड़ा की यह तस्वीर उत्तराखंड के दूसरे पर्वतीय जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। कई जिला, सामुदायिक और प्राथमिक चिकित्सालयों में डॉक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। कहीं पद खाली हैं तो कहीं चिकित्सकों की संख्या मरीजों के अनुपात में बेहद कम है।
ऐसे में सरकार की तबादला नीति भी सवालों के घेरे में आती है। यदि किसी दुर्गम या जिला अस्पताल से विशेषज्ञ चिकित्सक का तबादला किया जाता है, तो क्या उसी समय वहां नए डॉक्टर की तैनाती की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
पहाड़ में अस्पताल की इमारत खड़ी कर देना स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। उस अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर, विशेषज्ञ, जांच और उपचार की व्यवस्था होना ही वास्तविक स्वास्थ्य सेवा है।
राजनीतिक दलों की चुप्पी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों की खामोशी भी चर्चा का विषय बन गई है। संजय पाण्डे ने सवाल उठाया कि जब स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य मामलों में राजनीतिक दल मुखर होकर आवाज उठाते हैं, तो जिला मुख्यालय के प्रमुख अस्पताल में दो माह से फिजिशियन न होने जैसे गंभीर जनहित के मुद्दे पर चुप्पी क्यों है?
जनता का सवाल सीधा है—जब जिला मुख्यालय के अस्पताल में ही विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं होंगे तो दूरदराज के गांवों से आने वाला मरीज किस भरोसे पर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का दरवाजा खटखटाएगा?
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती
फिलहाल मांग सिर्फ रिक्त पद भरने की नहीं है। जरूरत इस बात की है कि जब तक स्थायी नियुक्ति नहीं होती, तब तक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत विशेषज्ञ चिकित्सक की तत्काल तैनाती की जाए, ताकि मरीजों को इलाज के लिए भटकना न पड़े।
अल्मोड़ा का मामला सरकार के लिए एक चेतावनी की तरह है। अगर समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई तो डॉक्टरों की कमी, तबादलों और रेफरल की यह श्रृंखला पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को और कमजोर कर सकती है।
सवाल यह नहीं कि डॉक्टर कब आएगा। असली सवाल यह है कि मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद भी उसे डॉक्टर के लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
पहाड़ के लोगों ने अस्पताल मांगे थे, सिर्फ भवन नहीं। उन्होंने इलाज मांगा था, सिर्फ बोर्ड और उद्घाटन नहीं। अब सरकार को तय करना है कि तबादलों की फाइल भारी होगी या मरीज की जिंदगी।

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