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26 साल का उत्तराखंड: दस मुख्यमंत्री, करोड़ों का बजट और सरकारी स्कूल अब भी बदहाल!

दर्पण न्यूज 24/7 |देहरादून

उत्तराखंड राज्य गठन को 26 साल होने को हैं। इन वर्षों में सत्ता के कई चेहरे बदले, सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं और दस कद्दावर चेहरे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, लेकिन सरकारी स्कूलों की तस्वीर आज भी उस सवाल के सामने खड़ी है जिसका जवाब सत्ता के गलियारों में लगातार टाला जाता रहा है—आखिर उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब पहुंचेगी?

राज्य गठन के बाद शिक्षा को लेकर घोषणाओं की कमी कभी नहीं रही। नई योजनाएं बनीं, करोड़ों रुपये के बजट का प्रावधान हुआ, स्मार्ट क्लास से लेकर डिजिटल शिक्षा तक के दावे किए गए। स्कूलों के कायाकल्प, आधारभूत ढांचे के विकास, शिक्षक प्रशिक्षण और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए योजनाओं की लंबी फेहरिस्त तैयार हुई।

लेकिन सवाल योजनाओं का नहीं, नतीजों का है।

धरातल पर  अब भी चिंताजनक है। सरकारी विद्यालय शिक्षक विहीन या शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं। कहीं एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है तो कहीं महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में समस्या और गंभीर है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस स्कूल में शिक्षक ही पर्याप्त नहीं होंगे, वहां स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और चमकदार योजनाएं बच्चों का भविष्य कैसे बदलेंगी?

विडंबना देखिए—सरकारी स्कूलों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लेकर उपलब्धियों का बखान किया जाता है, लेकिन उसी बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराने में व्यवस्था हांफती नजर आती है।

मिड-डे मील बच्चे को स्कूल तक ला सकता है, लेकिन शिक्षक ही उसे भविष्य तक पहुंचा सकता है।

यह बात नीति बनाने वालों को समझनी होगी।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सरकारी स्कूल सिर्फ शिक्षा के केंद्र नहीं हैं। ये गांवों की सामाजिक संरचना और अस्तित्व से जुड़े संस्थान हैं। जब स्कूल कमजोर होता है तो अभिभावक बच्चों को लेकर कस्बों और शहरों की ओर पलायन करते हैं। धीरे-धीरे गांव खाली होते हैं और फिर सवाल उठता है कि पहाड़ों में पलायन क्यों नहीं रुक रहा?

क्या हमने कभी इस कड़ी को गंभीरता से समझने की कोशिश की?

कमजोर सरकारी स्कूल—निजी स्कूलों की मजबूरी—शहरों की ओर पलायन—और अंततः खाली होते गांव। यह सिर्फ शिक्षा की कहानी नहीं, उत्तराखंड के सामाजिक भविष्य की कहानी है।

दूसरी तरफ निजी स्कूलों का विस्तार लगातार बढ़ता गया। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगे, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के सामने विकल्प सीमित हैं। सरकारी स्कूल कमजोर होंगे तो सबसे ज्यादा चोट उसी वर्ग को लगेगी जिसके लिए सरकार की शिक्षा व्यवस्था बनाई गई है।

राज्य गठन के बाद सरकारें आती-जाती रहीं। मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, विभागीय अधिकारी बदले और शिक्षा सुधार के नारे भी बदलते रहे। लेकिन कक्षा में बैठा बच्चा आज भी उसी सवाल के साथ खड़ा है—उसे पढ़ाएगा कौन?

यह सवाल किसी एक सरकार से नहीं, पूरे 26 साल की व्यवस्था से है।

सरकारों को अब यह तय करना होगा कि शिक्षा बजट केवल खर्च करने का आंकड़ा है या वास्तव में बच्चों के भविष्य में निवेश। स्कूलों में भवन बनाना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि उन भवनों में पर्याप्त शिक्षक हों। डिजिटल शिक्षा जरूरी है, लेकिन उससे पहले बुनियादी शिक्षा मजबूत हो। योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनका मूल्यांकन फाइलों से नहीं, विद्यालय की कक्षा में होना चाहिए।

उत्तराखंड को अब घोषणाओं की शिक्षा नहीं, परिणामों की शिक्षा चाहिए।

दुर्गम विद्यालयों के लिए अलग शिक्षक नीति बने। रिक्त पदों पर समयबद्ध भर्ती हो। शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ से मुक्त किया जाए। हर स्कूल की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए। अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की निगरानी मजबूत हो। और सबसे महत्वपूर्ण—सरकारी स्कूल को गरीब का स्कूल समझने वाली सोच खत्म की जाए।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार ने शिक्षा पर कितना पैसा खर्च किया।

सवाल यह है कि उस पैसे से एक बच्चे की जिंदगी कितनी बदली?

26 साल बाद उत्तराखंड को इस सवाल का जवाब चाहिए।

दस मुख्यमंत्री, कई सरकारें और शिक्षा सुधार की अनगिनत योजनाएं अपनी जगह हैं। लेकिन इतिहास सरकारों के नाम नहीं, बच्चों के भविष्य के परिणामों से लिखा जाएगा।

आज जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड की सरकारें सरकारी स्कूलों को केवल आंकड़ों में नहीं, धरातल पर मजबूत बनाएं।

क्योंकि अगर सरकारी स्कूल बचेंगे तो गांव बचेंगे, गांव बचेंगे तो पहाड़ बचेगा और पहाड़ बचेगा तभी उत्तराखंड का असली सपना जिंदा रहेगा।

दर्पण न्यूज 24/7 का सीधा सवाल—26 साल बाद भी अगर सरकारी स्कूल शिक्षक को तरस रहे हैं, तो आखिर शिक्षा सुधार की योजनाओं का हिसाब कौन देगा?

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