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मां बाराही धाम की अनोखी परंपरा: जहां सदियों से भक्तों को नहीं हुए मां की मूल प्रतिमा के प्रत्यक्ष दर्शन।

लोहाघाट। चम्पावत जिले की देवीधुरा की पवित्र धरती पर विराजमान मां बाराही धाम केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, लोकविश्वास और रहस्यमयी धार्मिक मान्यताओं का ऐसा संगम है, जिसकी कथा सुनकर श्रद्धालु भी श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। मां बाराही धाम अपनी ऐतिहासिक बग्वाल के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन इस धाम की एक ऐसी परंपरा भी है, जिसके बारे में जानकर हर श्रद्धालु के मन में कौतूहल पैदा होता है—आज तक किसी ने मां बाराही की मूल प्रतिमा के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं किए हैं।
मान्यता है कि मां बाराही की मूल प्रतिमा विशेष तांबे के पवित्र सिंहासन में विराजमान है। भक्तों के लिए यह सिंहासन ही मां के साक्षात स्वरूप का प्रतीक है। सदियों से श्रद्धालु मां के प्रत्यक्ष दर्शन की बजाय उनके सिंहासन के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते आ रहे हैं।
आक्रांताओं से जुड़ी है रहस्यमयी कथा
स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार मुगलकाल में आक्रांताओं ने मां बाराही की प्रतिमा को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया था। बताया जाता है कि क्षेत्र के लमगड़िया खाम के लोगों और सुनीगांव के बाड़ियों ने आक्रांताओं का मुकाबला कर मां की प्रतिमा को वापस प्राप्त किया।
किवदंती है कि जब आक्रांताओं को दिन के उजाले में मां की प्रतिमा के साथ वहां से हटाया गया तो अचानक तेज प्रकाश से उनकी आंखें चौंधिया गईं और उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी। इसके बाद मां की मूल प्रतिमा को विशेष तांबे के सिंहासन में विराजमान करने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।
साल में एक बार होता है सिंहासन का विशेष पूजन
इस पवित्र तांबे के सिंहासन में मां बाराही के साथ मां महाकाली और मां सरस्वती की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। वर्तमान में सिंहासन को मंदिर की दूसरी मंजिल पर मां बाराही की अष्टभुजा प्रतिमा के समीप रखा जाता है।
सालभर भक्त इस पवित्र सिंहासन की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, लेकिन रक्षाबंधन यानी बग्वाल के अवसर पर इसकी विशेष पूजा-अर्चना होती है। इस दौरान सिंहासन को मंदिर के समीप स्थित नंदघर में विराजमान कराया जाता है। मां के दर्शन और आशीर्वाद की कामना में दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
संतान की कामना लेकर रातभर जलते हैं दीप
मां बाराही की महिमा से जुड़ी मान्यताओं में निसंतान महिलाओं की आस्था विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मान्यता है कि संतान प्राप्ति की कामना लेकर महिलाएं निराजल उपवास रखती हैं और रातभर हाथों में दीपक लेकर मां बाराही से मनौती मांगती हैं। भोर तक जलता दीप उनकी अटूट आस्था, विश्वास और मां के प्रति समर्पण का प्रतीक बन जाता है।
अगले दिन विशेष परंपरा के तहत बागड़ जाति का व्यक्ति आंखों पर पट्टी बांधकर निर्धारित विधि-विधान से पवित्र प्रतिमाओं को गंगाजल और दूध से स्नान कराता है। इसके बाद मां को नए वस्त्र और आभूषण धारण कराए जाते हैं।
जयकारों के बीच निकलती है भव्य शोभायात्रा
पूजन-अनुष्ठान के बाद मां बाराही की भव्य शोभायात्रा निकलती है। मां के जयकारों से पूरा देवीधुरा गूंज उठता है और श्रद्धालुओं का सैलाब शोभायात्रा में उमड़ पड़ता है। शोभायात्रा मंदिर के समीप पहाड़ी पर स्थित मुचकंद ऋषि के आश्रम तक पहुंचती है।
इस परंपरा के पीछे भी एक गहरी धार्मिक मान्यता जुड़ी है। कहा जाता है कि काल भैरव संग्राम के दौरान मुचकंद ऋषि ने देवताओं की सहायता की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां बाराही ने उन्हें वरदान दिया था कि चिरनिद्रा में लीन होने के बाद वह स्वयं उन्हें दर्शन देंगी। इसी लोकविश्वास को जीवंत रखते हुए सदियों से यह परंपरा निभाई जा रही है।
आस्था का वह रहस्य, जो पीढ़ियों से चला आ रहा
देवीधुरा का मां बाराही धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और धार्मिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है। यहां की बग्वाल, तांबे के सिंहासन की परंपरा, मां की मूल प्रतिमा के प्रत्यक्ष दर्शन न होने की मान्यता, रातभर दीप जलाती श्रद्धालु महिलाएं और मुचकंद ऋषि के आश्रम तक निकलने वाली शोभायात्रा—हर परंपरा अपने भीतर सदियों की आस्था और लोककथाओं को समेटे हुए है।
मां की प्रतिमा के दर्शन भले ही आज तक किसी ने प्रत्यक्ष रूप से न किए हों, लेकिन भक्तों के विश्वास में मां बाराही की उपस्थिति उतनी ही सजीव है। शायद यही इस धाम का सबसे बड़ा रहस्य और इसकी सबसे बड़ी शक्ति है—जहां आंखों से अधिक आस्था देखती है और प्रतिमा से अधिक विश्वास मां का स्वरूप बन जाता है।

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