खबरें शेयर करें -

जनसेवा या सिर्फ चुनाव की तैयारी? हल्दूचौड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर आखिर क्यों खामोश हैं दावेदार?

 प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और जनप्रतिनिधि बनने की आकांक्षा रखने वाले लोगों की पहली पहचान जनता के मुद्दों पर उनकी सक्रियता से होती है। चुनावी मौसम में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब इन्हीं मुद्दों पर आवाज उठाने का समय आता है, तब अक्सर सन्नाटा दिखाई देता है।

हल्दूचौड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का मौजूदा मामला इसी सन्नाटे की कहानी कह रहा है। क्षेत्र के एकमात्र विशेषज्ञ चिकित्सक के कार्यमुक्त होने की स्थिति बन रही है, जबकि वैकल्पिक व्यवस्था अब तक सुनिश्चित नहीं हो सकी है। यदि ऐसा होता है तो लालकुआं विधानसभा क्षेत्र की बड़ी आबादी प्रभावित होगी और हजारों मरीजों को सामान्य उपचार के लिए भी हल्द्वानी सहित अन्य अस्पतालों का रुख करना पड़ेगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे मामले में वे तमाम राजनीतिक चेहरे आखिर कहां हैं, जो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में जनता का नेतृत्व करने का सपना देख रहे हैं? टिकट की दावेदारी करने वालों की संख्या कम नहीं है, लेकिन जनहित के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी आवाज सुनाई नहीं दे रही। क्या चुनाव केवल पोस्टर, बैठकों और सोशल मीडिया तक सीमित रह गया है, या फिर जनता के बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना भी राजनीतिक दायित्व का हिस्सा है?

यह सवाल केवल विधानसभा चुनाव के दावेदारों तक सीमित नहीं है। स्थानीय ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और विभिन्न राजनीतिक दलों के पदाधिकारी भी जनता के बीच अपनी सक्रियता का दावा करते हैं। ऐसे में जब स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा कमजोर होने की आशंका सामने है, तब उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

जनता यह जानना चाहती है कि यदि आज स्वास्थ्य सेवाओं को बचाने के लिए कोई पहल नहीं हो रही, तो कल जनप्रतिनिधि बनने के बाद ऐसी क्या उम्मीद की जाए कि यही लोग जनहित के बड़े मुद्दों पर संघर्ष करेंगे? जनसेवा केवल चुनाव लड़ने या पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को शासन तक मजबूती से पहुंचाने की जिम्मेदारी भी है।

यह किसी व्यक्ति या दल विशेष का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का सवाल है। स्वास्थ्य सेवाएं राजनीति से ऊपर का विषय हैं। यदि आज क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और दावेदार इस मुद्दे पर एकजुट होकर शासन से जवाब नहीं मांगते, तो यह संदेश जाएगा कि चुनावी महत्वाकांक्षा जनहित से बड़ी हो गई है।

अब समय आ गया है कि राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता का आकलन उनके बयानों से नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों पर उनके हस्तक्षेप से किया जाए। जनता देख रही है कि कौन उसके साथ खड़ा है और कौन केवल चुनाव आने का इंतजार कर रहा है। लोकतंत्र में जनता सबका मूल्यांकन करती है, और समय आने पर उसी के आधार पर अपना निर्णय भी देती है।

उत्तराखंड