अपनी ही सरकार में बेबस कार्यकर्ता, पूर्व कैबिनेट मंत्री गदरपुर विधायक अरविंद पांडे की पीएम से गुहार ने दिखाया सिस्टम को आईना!
शेरे तराई, पूर्व कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता ने पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता के परिवार की पीड़ा सुनाते हुए उठाए सवाल संगठन और सरकार की संवेदनशीलता पर चर्चा तेज!
दर्पण न्यूज ब्यूरो प्रमोद बमेटा
गदरपुर! “शेरे तराई” के नाम से पहचाने जाने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता, पूर्व कैबिनेट मंत्री और लगातार पांचवीं बार विधायक अरविंद पांडे ने एक मार्मिक अपील के जरिए प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन को आईना दिखा दिया है।
दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता रहे पांडे ने पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता के घर बैठकर जो भावनाएं व्यक्त कीं, वह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठते सवालों की गूंज बन गई है।
पांडे ने सीधे प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कहा कि देश में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और “नारी शक्ति वंदन” जैसे अभियान चलाने वाली सरकार के होते हुए भी एक भाजपा कार्यकर्ता और उसका परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
मामला प्रदेश के काशीपुर क्षेत्र से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां भाजपा कार्यकर्ता गगन कम्बोज के साथ कथित रूप से अन्याय हुआ। आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव में एक चिकित्सक को धमकी दी गई और उसके चलते कार्यकर्ता का काम बंद करा दिया गया। इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया है—घर में बैठी पत्नी, मासूम बेटियां और वृद्ध पिता की आंखों में आंसू इस पीड़ा की गवाही दे रहे हैं।
पांडे ने भावुक स्वर में कहा कि “जब गरीब और समर्पित कार्यकर्ता के पेट पर लात मारी जाती है, तो उसकी आह बहुत भारी पड़ती है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे छोटे से कार्यकर्ता के लिए प्रधानमंत्री से गुहार लगाने को मजबूर हैं, जबकि प्रदेश में उनकी ही पार्टी की सरकार है।
यह बयान कई बड़े सवाल खड़े करता है—क्या संगठन और सरकार के स्तर पर कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही? क्या स्थानीय स्तर पर समस्याएं इतनी बढ़ गई हैं कि वरिष्ठ नेता को सीधे प्रधानमंत्री तक बात पहुंचानी पड़ रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि संगठन के अंदर संवाद और संवेदनशीलता की स्थिति को दर्शाने वाला संकेत है। भाजपा जैसे कैडर आधारित संगठन में यदि कार्यकर्ता खुद को असहाय महसूस करे, तो यह चिंतन का विषय बन जाता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस मार्मिक अपील के बाद सरकार और संगठन किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
