जब रिकॉर्ड नहीं, भरोसा इतिहास लिखता है
पं. नारायण दत्त तिवारी का रिकॉर्ड तोड़ सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बने पुष्कर सिंह धामी, उत्तराखंड की राजनीति में स्थिर नेतृत्व का नया अध्याय।
प्रमोद बमेटा |
दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास जितना संघर्षों से भरा रहा है, उतना ही नेतृत्व परिवर्तन के लिए भी जाना जाता रहा है। इस छोटे से पहाड़ी राज्य ने पिछले ढाई दशक में कई मुख्यमंत्री देखे। सत्ता बदली, चेहरे बदले, प्राथमिकताएं बदलीं और कई बार राजनीतिक अस्थिरता ने विकास की रफ्तार को भी थाम दिया। लेकिन 4 जुलाई 2026 को उत्तराखंड की राजनीति ने एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसे आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विकास पुरुष स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज करा लिया। यह उपलब्धि केवल कैलेंडर के दिनों की गिनती नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक है, जिसकी उत्तराखंड लंबे समय से तलाश कर रहा था।
धामी जब जुलाई 2021 में मुख्यमंत्री बने थे, तब परिस्थितियां आसान नहीं थीं। कोरोना महामारी के बाद की आर्थिक चुनौतियां थीं, युवाओं में रोजगार को लेकर असंतोष था और भर्ती परीक्षाओं में धांधली के आरोपों ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे। ऐसे समय में युवा मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार चलाने की नहीं, बल्कि जनता का भरोसा वापस जीतने की थी।
शायद यही वजह रही कि धामी सरकार ने शुरुआत से ही संदेश दिया कि व्यवस्था को केवल चलाना नहीं, बदलना भी है। भर्ती परीक्षाओं में नकल और धांधली पर सख्ती के लिए देश के सबसे कठोर माने जाने वाले नकल विरोधी कानून को लागू किया गया। वर्षों से निराश बैठे हजारों युवाओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्तियां मिलीं तो पहली बार यह संदेश गया कि मेहनत का रास्ता फिर खुल रहा है।
लेकिन धामी सरकार ने केवल सरकारी नौकरी को ही समाधान नहीं माना। स्वरोजगार, कौशल विकास और उद्योगों को समान महत्व देने की नीति अपनाई गई। मुख्यमंत्री कौशल उन्नयन एवं वैश्विक रोजगार योजना के माध्यम से युवाओं को विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण देकर अंतरराष्ट्रीय रोजगार बाजार से जोड़ने का प्रयास किया गया। राज्य के भीतर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने की दिशा में भी लगातार पहल हुई।
महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए स्वयं सहायता समूहों को मजबूत किया गया। ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने के प्रयास हुए और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की अवधारणा को गांवों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। यह बदलाव केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रहे, इसके लिए प्रशासनिक मशीनरी को भी लगातार सक्रिय रखने की कोशिश दिखाई दी।
धामी सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड ने निवेश के क्षेत्र में भी नई पहचान बनाने का प्रयास किया। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट ने राज्य की संभावनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया। सरकार का दावा है कि इन निवेश प्रस्तावों से रोजगार और औद्योगिक विकास के नए अवसर तैयार हो रहे हैं।
धार्मिक पर्यटन को उत्तराखंड की आर्थिक ताकत बनाने की दिशा में भी सरकार ने कई कदम उठाए। चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं में सुधार, केदारखंड और मानसखंड से जुड़े विकास कार्य, सड़क और कनेक्टिविटी का विस्तार तथा पर्यटन सुविधाओं का आधुनिकीकरण सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा।
धामी सरकार की पहचान केवल विकास योजनाओं से नहीं बनी, बल्कि कई ऐसे निर्णयों से भी बनी जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड को चर्चा के केंद्र में ला दिया। समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में पहल, धर्मांतरण विरोधी कानून, नकल विरोधी कानून और अग्निवीरों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण जैसे निर्णयों ने यह संदेश दिया कि सरकार कठिन फैसले लेने से पीछे नहीं हटना चाहती।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में धामी की सबसे बड़ी ताकत केवल निर्णय लेने की क्षमता नहीं, बल्कि उनका व्यवहार भी रहा है। सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड अपने नाम करने के बाद भी उन्होंने कभी इसे व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। सार्वजनिक मंचों से उन्होंने बार-बार कहा कि उत्तराखंड का विकास किसी एक मुख्यमंत्री का नहीं, बल्कि सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और प्रदेशवासियों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी के औद्योगिक विजन को नमन किया, मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के सुशासन की सराहना की और कांग्रेस तथा भाजपा दोनों दलों के पूर्व मुख्यमंत्रियों के योगदान को स्वीकार करते हुए राजनीतिक मर्यादा का उदाहरण पेश किया। आज के तीखे राजनीतिक माहौल में यह शैली उन्हें अलग पहचान देती है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि किसी भी सरकार की वास्तविक परीक्षा रिकॉर्ड बनने के बाद शुरू होती है। पलायन, पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निजी क्षेत्र में रोजगार और पर्यावरणीय चुनौतियां आज भी उत्तराखंड के सामने खड़ी हैं। जनता की अपेक्षाएं अब पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी हैं।
फिर भी यह दिन उत्तराखंड की राजनीति में एक मील का पत्थर बन गया है। क्योंकि यह पहली बार है जब राज्य ने नेतृत्व की स्थिरता को इतने लंबे समय तक महसूस किया है। राजनीति में रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन कुछ रिकॉर्ड समय के साथ एक युग की पहचान बन जाते हैं।
आज जब उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें यह पंक्ति अवश्य दर्ज होगी कि 4 जुलाई 2026 को पुष्कर सिंह धामी ने केवल एक रिकॉर्ड नहीं तोड़ा, बल्कि यह साबित किया कि यदि नेतृत्व में निर्णय लेने का साहस, संगठन का विश्वास और जनता का समर्थन हो, तो पहाड़ की राजनीति भी स्थिरता का नया इतिहास लिख सकती है।
