पहाड़ की बेटियों ने थामी दुग्ध क्रांति की कमान, नैनीताल दुग्ध संघ ने खोली 702वीं समिति!
सेला गांव में हुआ शुभारंभ, 2026-27 तक प्रतिदिन 1.55 लाख लीटर दूध संग्रहण का लक्ष्य, 75 फीसदी महिला दुग्ध उत्पादकों के भरोसे आगे बढ़ रहा सहकारिता अभियान!
दर्पण न्यूज 24×7 | लालकुआं
पर्वतीय क्षेत्रों में दुग्ध सहकारिता को नई मजबूती देते हुए नैनीताल दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड ने अपनी 702वीं दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति का शुभारंभ कर दिया। सेला गांव में आयोजित कार्यक्रम में संघ के अध्यक्ष मुकेश बोरा ने फीता काटकर समिति का उद्घाटन किया। खास बात यह रही कि संचालन के पहले ही दिन समिति के माध्यम से 60 लीटर दूध का संग्रहण किया गया, जिसे ग्रामीणों ने दुग्ध सहकारिता की नई शुरुआत के रूप में देखा।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुकेश बोरा ने कहा कि पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक मजबूती में दुग्ध सहकारिता आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने दुग्ध उत्पादकों से उत्पादन बढ़ाने, गुणवत्ता बनाए रखने और सहकारी समितियों को और अधिक सशक्त बनाने का आह्वान किया।
उन्होंने बताया कि दुग्ध विकास मंत्री सौरभ बहुगुणा के निर्देश पर नैनीताल दुग्ध संघ ने वित्तीय वर्ष 2026-27 तक प्रतिदिन 1.55 लाख लीटर दूध संग्रहण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को नई दुग्ध समितियों के गठन, अधिक से अधिक किसानों को सहकारिता से जोड़ने तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के माध्यम से हासिल किया जाएगा।
मुकेश बोरा ने बताया कि वर्तमान में संघ से करीब 40 हजार दुग्ध उत्पादक जुड़े हुए हैं, जिनमें लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं हैं। पशुपालन से लेकर दुग्ध समितियों के संचालन तक महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने सहकारिता आंदोलन को नई ऊर्जा दी है। वर्तमान में नैनीताल जनपद में 702 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां संचालित हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
कार्यक्रम में पीएंडआई प्रभारी सुभाष बाबू, सहायक प्रबंधक मीना रौतेला, एफओ शांति कोरंगा, महिला डेयरी मार्ग प्रभारी बसंती, मनीष रमोला, ग्राम प्रधान प्रताप सिंह सहित बड़ी संख्या में महिला दुग्ध उत्पादकों और ग्रामीणों ने भाग लिया।
पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और नई दुग्ध समितियों का विस्तार इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड में दुग्ध सहकारिता केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की मजबूत कड़ी बनती जा रही है। यदि 1.55 लाख लीटर प्रतिदिन संग्रहण का लक्ष्य तय समय में हासिल होता है, तो इसका सीधा लाभ हजारों दुग्ध उत्पादक परिवारों की आय पर पड़ेगा।
