








बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाने की लड़ाई फिर तेज!
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में बंद होने की कगार पर पहुंचा प्रकरण, राजेंद्र टोलिया ने 100 पन्नों के जवाब से फिर उठाई अधिसूचना की मांग
हल्दूचौड़/बिंदुखत्ता। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर सुर्खियों में है। बिंदुखत्ता निवासी एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग से आने वाले राजेंद्र सिंह टोलिया ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष लंबित प्रकरण को बंद किए जाने के बजाय वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित किए जाने की मांग को लेकर आयोग के समक्ष विस्तृत जवाब दाखिल किया है।
बताया गया है कि आयोग की ओर से पिछले सप्ताह श्री टोलिया को पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें 30 दिनों के भीतर प्रकरण बंद किए जाने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद उन्होंने प्रकरण को बंद करने पर सहमति जताने के बजाय आयोग के समक्ष दस्तावेजों और पूर्व में हुई सरकारी कार्रवाई का हवाला देते हुए अपना विस्तृत पक्ष रखा।
करीब 100 पृष्ठों के इस जवाब ने बिंदुखत्ता के राजस्व ग्राम के मुद्दे को एक बार फिर प्रशासनिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। जवाब में विभिन्न दस्तावेजों के साथ जिला स्तरीय वन अधिकार समिति की 19 जून 2024 की आख्या एवं अनुपूरक पत्र, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा 8 नवंबर 2013 को जारी पत्र एवं निर्देशों तथा उत्तराखंड शासन से संबंधित टीप का उल्लेख किया गया है।
टोलिया ने अपने जवाब में 14 टोंगिया ग्रामों में से छह ग्रामों में अपनाई गई प्रक्रिया का भी हवाला दिया है। उनका तर्क है कि उपलब्ध सरकारी अभिलेखों और वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर बिंदुखत्ता के मामले में भी आवश्यक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है।
अब सवाल प्रकरण बंद होने का नहीं, समाधान का!
राजेंद्र सिंह टोलिया ने आयोग से अनुरोध किया है कि उपलब्ध अभिलेखों और वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का परीक्षण करते हुए बिंदुखत्ता राजस्व ग्राम की अधिसूचना जारी कराने के लिए उत्तराखंड शासन के राजस्व सचिव को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
ऐसे में बिंदुखत्ता के लोगों की निगाहें अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। वर्षों से राजस्व ग्राम के दर्जे की मांग कर रहे ग्रामीणों के लिए यह मामला केवल एक प्रशासनिक अधिसूचना का विषय नहीं, बल्कि भूमि, अधिकार और भविष्य की स्थायी व्यवस्था से जुड़ा सवाल बन चुका है।
अब देखना यह है कि आयोग इस विस्तृत जवाब और प्रस्तुत किए गए अभिलेखों पर क्या रुख अपनाता है—क्या वर्षों से लंबित बिंदुखत्ता राजस्व ग्राम का मामला फिर आगे बढ़ेगा या प्रकरण बंद कर दिया जाएगा?
बिंदुखत्ता की निगाहें फिलहाल इसी सवाल के जवाब पर टिकी हैं।
