बहुत कठिन है डगर पनघट की…! ‘मिशन 2027’ में त्रिवेंद्र-अजय के कंधों पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी, क्या पार कर पाएंगे ये दिग्गज अपनी चुनौतियों की अग्निपरीक्षा?
प्रमोद बमेटा
ब्यूरो, दर्पण न्यूज 24/7
देहरादून। “बहुत कठिन है डगर पनघट की…” यह कहावत इन दिनों उत्तराखंड की सियासत में भारतीय जनता पार्टी की चुनावी तैयारियों पर बिल्कुल सटीक बैठती दिखाई दे रही है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी ने अभी से रणनीतिक मोर्चाबंदी शुरू कर दी है, लेकिन इस बार चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही घर की कई जटिल परिस्थितियां भी हैं।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में पार्टी नेतृत्व ने हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत और नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सांसद अजय भट्ट को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। दोनों वरिष्ठ नेताओं को उन विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने और पार्टी की स्थिति बेहतर बनाने का दायित्व दिया गया है, जहां पिछली बार अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी थी।
कागजों पर यह जिम्मेदारी जितनी सरल दिखती है, जमीन पर उतनी ही कठिन नजर आती है। कई क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कुछ स्थानों पर स्थानीय स्तर पर असंतोष की चर्चाएं हैं, जबकि टिकट की संभावित दावेदारी बढ़ने के साथ गुटबाजी और आंतरिक खींचतान की आशंकाएं भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चुनावी वर्ष नजदीक आते-आते टिकट वितरण सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है। यदि दावेदारों की नाराज़गी समय रहते नहीं संभाली गई, तो उसका असर कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकता है। ऐसे में संगठन को केवल बैठकें करने से आगे बढ़कर कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखना और स्थानीय स्तर पर समन्वय मजबूत करना होगा।
विपक्ष भी इस बार सत्ता पक्ष को घेरने की तैयारी में है। क्षेत्रीय सक्रियता, स्थानीय मुद्दों और जनप्रतिनिधियों की उपलब्धता जैसे विषय चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। ऐसे में भाजपा के सामने संगठनात्मक मजबूती के साथ-साथ जनता के बीच लगातार संवाद बनाए रखने की भी चुनौती रहेगी।
अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने लंबे संगठनात्मक अनुभव का लाभ पार्टी को दिला पाएंगे? क्या अजय भट्ट कमजोर मानी जा रही सीटों पर कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर सकेंगे? क्या टिकट वितरण के बाद भी पार्टी पूरी तरह एकजुट रह पाएगी? और सबसे अहम सवाल—क्या भाजपा संभावित सत्ता-विरोधी माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल होगी?
फिलहाल इतना तय है कि वर्ष 2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल विपक्ष से मुकाबले का नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक चुनौतियों से भी जूझने का चुनाव साबित हो सकता है। रणनीति बन चुकी है, जिम्मेदारियां तय हो चुकी हैं, लेकिन असली परीक्षा अब मैदान में होगी।
