“दिल है कि मानता नहीं… डॉक्टर भी ‘दिल’ के नहीं!”
करोड़ों का मेडिकल कॉलेज, पर कार्डियोलॉजिस्ट गायब — हृदय रोगी बोले, ‘दिल्ली दिल वालों की है, पर अल्मोड़ा का दिल कौन संभाले?’
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो
अल्मोड़ा।
जनपद में दिल के मरीजों की धड़कनें अब डॉक्टर नहीं, किस्मत के भरोसे चल रही हैं। करोड़ों की लागत से बने मेडिकल कॉलेज में जब दिल का ही डॉक्टर नहीं, तो फिर इमारतों की ऊँचाई से इलाज कैसे होगा?
करीब 6 लाख से अधिक आबादी वाले अल्मोड़ा जिले में कार्डियोलॉजिस्ट का पद ही स्वीकृत नहीं है। नतीजा यह कि हृदय रोगियों का इलाज फिजिशियन कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि अगर किसी मरीज का दिल “जरा तेज़” धड़क जाए, तो एम्बुलेंस सीधे हल्द्वानी, बरेली, दिल्ली या गुड़गांव की दिशा में दौड़ पड़ती है — मानो दिल का इलाज नहीं, तीर्थयात्रा हो रही हो।
“दिल ढूंढता है फिर वही… कार्डियोलॉजिस्ट की गली”
मेडिकल कॉलेज खुलने पर उम्मीद जगी थी कि अब अल्मोड़ा ही नहीं, बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़ और ग्वालधाम के लोगों को भी बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि इकोकार्डियोग्राफी और एंजियोग्राफी जैसी बुनियादी जांच सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
सरकार के दावों की धड़कनें तेज़ हैं, पर जमीनी सच्चाई का ईसीजी कुछ और ही कहानी सुना रहा है।
“भवन ऊंचा, सुविधाएं नीची”
करोड़ों रुपये खर्च कर मेडिकल कॉलेज तो बना दिया गया, लेकिन कार्डियोलॉजिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट चिकित्सकों की तैनाती अब भी फाइलों में ही धड़क रही है।
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सीपी भैसोड़ा का कहना है कि कार्डियोलॉजिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट के पदों की स्वीकृति के लिए शासन व महानिदेशक स्तर पर लगातार पत्राचार किया जा रहा है। मरीजों को बेहतर सुविधा देने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं।
पर सवाल वही है —
जब तक “स्वीकृति” आएगी, तब तक कितने दिल इंतजार में धड़कते रहेंगे?
इलाज महंगा, सफर लंबा
जनपद में जांच सुविधा न होने के कारण मरीजों को बड़े शहरों में महंगा इलाज करवाना पड़ रहा है। गरीब मरीजों के लिए यह बीमारी से बड़ी परेशानी बन चुकी है।
आखिरी शेर में सच्चाई…
“इमारतें खड़ी कर दीं, सुविधाएं रह गईं अधूरी,
दिल के शहर में डॉक्टर नहीं — ये कैसी मजबूरी।”
अब देखना यह है कि शासन की फाइलों में अटका यह ‘दिल का मामला’ कब जमीन पर उतरता है, या फिर अल्मोड़ा के मरीज यूं ही दूसरे शहरों की ओर दिल थामे सफर करते रहेंगे।
