चार साल बेमिसाल या अधूरी तस्वीर?—विकास के दावों के बीच पहाड़ का दर्द!
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून!
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में चार साल पूरे होने पर सरकार जहां उपलब्धियों का बखान कर रही है, वहीं पहाड़ के दूरस्थ गांवों से उठती आवाजें एक अलग ही कहानी कह रही हैं। विकास के चमकते आंकड़ों और जमीनी सच्चाई के बीच का यह फासला अब सवाल खड़े करने लगा है।
सरकार का दावा है कि राज्य ने नरेंद्र मोदी के “विकसित भारत @ 2047” के विजन को साकार करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन क्या सच में विकास का यह मॉडल हर व्यक्ति तक पहुंच पाया है?
बेरोजगारी की चुभती हकीकत!
सरकारी आंकड़ों में रोजगार सृजन की बात जरूर कही जाती है, लेकिन पहाड़ों के युवा आज भी नौकरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। गांवों में खाली पड़े घर और सूने आंगन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि रोजगार का संकट अभी भी गहराया हुआ है।
स्वास्थ्य सेवाएं—दावों से दूर जमीनी हालात!
अटल आयुष्मान योजना के तहत लाखों लोगों को लाभ मिलने के दावे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है। कई जगहों पर मरीजों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी मीलों दूर जाना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में समय पर इलाज न मिल पाना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सड़क, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं का अभाव!
विकास के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के बीच पहाड़ों के कई गांव आज भी सड़क, अच्छी शिक्षा और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। बरसात के दिनों में सड़कें टूट जाती हैं, बच्चे जोखिम भरे रास्तों से स्कूल जाने को मजबूर हैं, और कई क्षेत्रों में इंटरनेट व संचार की स्थिति भी कमजोर बनी हुई है।
पर्यटन बढ़ा, पर स्थानीयों को कितना लाभ?
पर्यटन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सवाल यह है कि इसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों तक कितना पहुंचा? बड़े होटलों और बाहरी निवेशकों के बीच स्थानीय छोटे व्यवसायी अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
विकास बनाम संतुलन का सवाल!
तेजी से हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के बीच पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं। पहाड़ों की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर विकास की रफ्तार कहीं भविष्य के लिए खतरा न बन जाए—यह सवाल भी उठने लगे हैं।
सवाल यही है—क्या केवल आंकड़ों से विकास की तस्वीर पूरी हो जाती है?
चार सालों में हुए कार्यों को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब तक पहाड़ के अंतिम गांव तक सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक “विकास का मॉडल” अधूरा ही रहेगा।
उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे केवल विकास नहीं, बल्कि समावेशी और संतुलित विकास की जरूरत है—ताकि हर पहाड़ी, हर गांव और हर नागरिक खुद को इस प्रगति का हिस्सा महसूस कर सके।
