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सहानुभूति नहीं, सपनों को उड़ान दे रहा ‘सेवालय’

27 दिव्यांग बच्चों के लिए बना उम्मीदों का घर, शिक्षा, खेल और रोजगार से लिखी जा रही आत्मनिर्भरता की नई इबारत

प्रमोद बमेटा, ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7 हल्द्वानी।

समाज में दिव्यांग बच्चों को अक्सर दया और सहानुभूति की नजर से देखा जाता है, लेकिन एक छोटा-सा संस्थान इस सोच को बदलने का बड़ा अभियान चला रहा है। यहां बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि वे अपनी परिस्थितियों पर अफसोस करें, बल्कि यह विश्वास दिया जाता है कि वे भी अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं। यही सोच ‘सेवालय’ को एक सामान्य आश्रय गृह से अलग पहचान देती है।

एक मई 2024 को समाजसेवी रोहित जोशी की पहल पर शुरू हुआ सेवालय आज दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए उम्मीदों का ऐसा घर बन चुका है, जहां संवेदनाएं केवल शब्द नहीं, बल्कि हर दिन किए जाने वाले प्रयासों में दिखाई देती हैं। वर्तमान में यहां श्रवण बाधित, दृष्टिबाधित और शारीरिक रूप से दिव्यांग 27 बच्चे पारिवारिक माहौल में रहकर पढ़ाई, खेल और जीवन कौशल सीख रहे हैं।

संस्थान का उद्देश्य बच्चों को केवल संरक्षण देना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान दिलाना है। इसी सोच का परिणाम है कि इस वर्ष 13 बच्चों का हाईस्कूल में प्रवेश कराया गया है, जबकि पिछले वर्षों में हाईस्कूल उत्तीर्ण कर चुके दो विद्यार्थियों ने इंटरमीडिएट में कदम रखा है।

खेल के मैदान में भी गूंजा सेवालय का नाम

सेवालय के बच्चे केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं। हाल ही में संस्थान के दो बच्चों ने राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल प्रतियोगिता में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया, जबकि एक अन्य विद्यार्थी ने राज्य स्तरीय शतरंज प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान हासिल कर यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा की मोहताज नहीं होती।

‘रुनझुन बुटीक’ बना आत्मनिर्भरता की पाठशाला

संस्थान ने रोजगारपरक प्रशिक्षण को अपनी कार्यशैली का अहम हिस्सा बनाया है। ‘रुनझुन बुटीक’ में बच्चे सिलाई, डिजाइनिंग और उत्पादों की मार्केटिंग सीख रहे हैं। इसके अलावा वे गोबर से पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद, कृत्रिम फूल, गृह सज्जा की सामग्री, राखियां, दीपावली के दीये और अन्य हस्तनिर्मित वस्तुएं तैयार करते हैं, जिन्हें बाजार में सराहना मिल रही है।

डिजिटल युग की जरूरतों को देखते हुए बच्चों को कंप्यूटर संचालन और डिजिटल साक्षरता का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। फोटो फ्रेम निर्माण का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले दो बच्चों को रोजगार भी मिल चुका है, जो संस्थान के प्रयासों की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

जनसहयोग से जल रहा उम्मीदों का यह दीप

सेवालय की सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि इसे किसी प्रकार की सरकारी आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती। यह पूरा संस्थान समाजसेवियों, दानदाताओं और स्थानीय लोगों के सहयोग से संचालित हो रहा है। आने वाले समय में इसे एक आदर्श आवासीय एवं कौशल विकास केंद्र बनाने और ‘रुनझुन बुटीक’ को पूर्ण स्वरोजगार मॉडल के रूप में विकसित करने की योजना है।

संस्थान के सचिव रोहित जोशी कहते हैं, “इन बच्चों को सहानुभूति नहीं, अवसर चाहिए। यदि सही मार्गदर्शन और विश्वास मिले तो यही बच्चे भविष्य में दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।”

सेवालय के अध्यक्ष नीमा बिष्ट, उपाध्यक्ष मीनाक्षी, कोषाध्यक्ष भावना जोशी, संयुक्त सचिव दीपा पुनेरा तथा सदस्य निर्मला पंत, यामिनी बिष्ट और भावना मझगांई इस सामाजिक अभियान को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

यह कहानी केवल एक संस्था की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो यह विश्वास दिलाती है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि अवसरों की कमी सबसे बड़ी बाधा होती है। सही सहयोग मिले तो यही बच्चे समाज की ताकत बन सकते हैं।

उत्तराखंड