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डिजिटल क्रांति से बदला उत्तराखंड का खनन क्षेत्र!

आरएफआईडी, एमडीटीएसएस और ई-चेक गेट से खनन व्यवस्था में बढ़ी पारदर्शिता, राजस्व संग्रह में भी बड़ा उछाल!

दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | प्रमोद बमेटा

देहरादून। कभी मैन्युअल प्रक्रियाओं, अवैध खनिज परिवहन और निगरानी की चुनौतियों से जूझ रहा उत्तराखंड का खनन क्षेत्र अब डिजिटल तकनीक के सहारे नई तस्वीर पेश कर रहा है। आरएफआईडी, एमडीटीएसएस, ई-चेक गेट, एएनपीआर कैमरे और ऑनलाइन ई-रवाना व्यवस्था ने खनिज परिवहन की निगरानी को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और खनन निदेशक राजपाल लेघा के मार्गदर्शन में लागू की गई तकनीकी व्यवस्थाओं के जरिए खनन गतिविधियों से लेकर खनिज परिवहन और राजस्व संग्रह तक की प्रक्रिया को डिजिटल निगरानी से जोड़ा गया है।

आरएफआईडी से वाहनों की डिजिटल पहचान!

राज्य में माइनिंग डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन एंड सर्विलांस सिस्टम (एमडीटीएसएस) के साथ खनन वाहनों में रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। खनन क्षेत्र से निकलने वाले पंजीकृत वाहनों पर लगाए गए टैग के माध्यम से ई-चेक गेट पर वाहन की पहचान और परमिट का डिजिटल सत्यापन किया जाता है।

देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर के प्रमुख मार्गों पर स्थापित अत्याधुनिक ई-चेक गेट इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वाहन के गुजरते ही उसकी डिजिटल जानकारी सिस्टम में दर्ज हो जाती है।

कैमरों की नजर में हर वाहन!

व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (एएनपीआर) कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन कर उपलब्ध रिकॉर्ड से उसका मिलान करते हैं। इससे संदिग्ध या नियमों के विपरीत संचालित वाहनों की पहचान में मदद मिलती है।

वहीं, तौल प्रणालियों को केंद्रीय सॉफ्टवेयर से जोड़ने से ओवरलोडिंग और वजन में गड़बड़ी पर निगरानी मजबूत हुई है।

300 करोड़ से बढ़कर 1217 करोड़ से अधिक राजस्व!

डिजिटल निगरानी और ऑनलाइन व्यवस्था का असर खनन राजस्व पर भी दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। पूर्व में राज्य का वार्षिक खनन राजस्व करीब 300 से 350 करोड़ रुपये के आसपास बताया जाता था, जबकि हालिया वित्तीय वर्ष में खनन विभाग ने 1217 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व अर्जित किए जाने की जानकारी दी है।

खनन सुधारों में देशभर में दूसरे स्थान पर रहने के चलते केंद्र सरकार की ओर से उत्तराखंड को 200 करोड़ रुपये की विशेष वित्तीय प्रोत्साहन सहायता स्वीकृत किए जाने की बात भी सामने आई है। इस राशि का उपयोग तकनीकी निगरानी व्यवस्था को पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तार देने में किया जा रहा है।

स्टेट कंट्रोल सेंटर से जिलों तक निगरानी!

देहरादून में स्थापित माइनिंग स्टेट कंट्रोल सेंटर और जिला स्तर पर बनाए गए मिनी कमांड सेंटरों के माध्यम से खनिज परिवहन पर नजर रखी जा रही है। वहीं खनिज मित्र पोर्टल और एम-चेक मोबाइल ऐप के जरिए अधिकारी फील्ड में ही वाहनों से जुड़ी जानकारी तत्काल देख सकते हैं।

स्टोन क्रशर और स्क्रीनिंग प्लांट के सीसीटीवी कैमरों तथा धर्मकांटों को सरकारी सर्वर से लिंक करना अनिवार्य किया गया है। नियमों का पालन नहीं करने वाले प्रतिष्ठानों के ई-रवाना पोर्टल को ब्लॉक करने जैसी कार्रवाई का प्रावधान भी व्यवस्था को सख्त बनाता है।

अवैध खनन पर शिकंजा, पर्यावरण संरक्षण की उम्मीद!

अवैध और अनियंत्रित खनन का असर सरकारी राजस्व के साथ-साथ नदियों और पर्यावरण पर भी पड़ता रहा है। ऐसे में डिजिटल निगरानी व्यवस्था से खनन गतिविधियों और खनिज परिवहन पर नजर मजबूत होने से पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

अन्य राज्य भी ले रहे तकनीकी मॉडल की जानकारी!

उत्तराखंड की डिजिटल खनन व्यवस्था को अब दूसरे राज्यों के लिए भी एक संभावित मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों द्वारा इस तकनीकी व्यवस्था का अध्ययन किए जाने की बात कही जा रही है।

कुल मिलाकर, पहाड़ी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखंड में खनन व्यवस्था का यह डिजिटल बदलाव केवल निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि पारदर्शिता, राजस्व संरक्षण, अवैध खनन पर नियंत्रण और पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।