








दायित्वधारियों के लिए टिकट का संकट? धामी की दो टूक नसीहत से बढ़ी सियासी हलचल!
2027 की चुनावी सरगर्मी के बीच दायित्व की कुर्सी से टिकट की कुर्सी तक आसान नहीं दिख रही राह!
दर्पण न्यूज 24/7
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा के भीतर संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ने लगी है। इसी बीच सरकार में दायित्व संभाल रहे नेताओं को लेकर भी सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में मुख्य सेवक सदन में हुई दायित्वधारियों और राज्य मंत्रियों की बैठक के बाद सामने आए कथित संदेश को अब चुनावी तैयारियों के बीच अहम संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
बैठक में सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने, जनसमस्याओं के समाधान और सरकार-संगठन के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया। लेकिन बैठक के बाद बंद कमरे में हुई कथित बातचीत ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी। सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने कुछ दायित्वधारियों की विधानसभा चुनाव को लेकर बढ़ती सक्रियता पर नाराजगी जताते हुए साफ संकेत दिया कि सरकार में मिला दायित्व विधानसभा टिकट की गारंटी नहीं है।
दायित्व मिला, अब टिकट की दावेदारी!
सूत्रों की मानें तो कुछ विधानसभा क्षेत्रों से शिकायतें सामने आई थीं कि कुछ दायित्वधारी और राज्य मंत्री अपने क्षेत्रों में सक्रिय होकर खुद को आगामी विधानसभा चुनाव का संभावित प्रत्याशी बताने लगे हैं। समर्थकों के बीच टिकट को लेकर माहौल बनाने की चर्चाएं भी सामने आईं।
इससे उन नेताओं और कार्यकर्ताओं में असहजता पैदा होने की बात कही गई, जो लंबे समय से संगठन के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की कथित नसीहत को दायित्वधारियों के लिए स्पष्ट राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
दायित्व की कुर्सी से टिकट की कुर्सी तक आसान नहीं राह!
सरकार में दायित्व मिलना किसी भी नेता की राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव को बढ़ा सकता है, लेकिन विधानसभा टिकट का फैसला अलग राजनीतिक कसौटियों पर होता है। क्षेत्र में पकड़, संगठन के भीतर स्वीकार्यता, जनता के बीच प्रभाव और चुनावी जीत की संभावना जैसे कई पहलू टिकट वितरण में भूमिका निभाते हैं।
यही वजह है कि दायित्वधारियों के बीच भी यह सवाल उठने लगा है कि सरकार में जिम्मेदारी मिलने के बावजूद क्या पार्टी नेतृत्व उन्हें विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाने के पक्ष में होगा?
संभावित दावेदारों की बढ़ती सक्रियता!
2027 का चुनाव भले अभी दूर हो, लेकिन प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर संभावित दावेदारों ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ा दी हैं। संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं से लेकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय नेताओं तक कई चेहरे टिकट की दौड़ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटे हैं।
ऐसे माहौल में दायित्वधारियों की सक्रियता पार्टी के भीतर नए समीकरण पैदा कर सकती है। यदि एक ही सीट पर दायित्वधारी और लंबे समय से संगठन में सक्रिय नेता टिकट के दावेदार होंगे तो पार्टी नेतृत्व के सामने भी संतुलन साधने की चुनौती होगी।
धामी की नसीहत के सियासी मायने!
मुख्यमंत्री की कथित सख्ती को लेकर भाजपा के भीतर अलग-अलग राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। इसे जहां कुछ लोग दायित्वधारियों को उनकी जिम्मेदारी तक सीमित रखने का संदेश मान रहे हैं, वहीं इसे 2027 के टिकट वितरण से पहले संगठनात्मक अनुशासन कायम करने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है।
सियासी संदेश का सार यही माना जा रहा है कि सरकार का दायित्व जनता और सरकार के बीच सेतु की भूमिका निभाने के लिए है, इसे विधानसभा टिकट की गारंटी नहीं माना जा सकता।
अब नजर दायित्वधारियों के अगले कदम पर!
मुख्यमंत्री की कथित नसीहत के बाद अब नजर उन दायित्वधारियों पर है, जो अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में लगातार सक्रिय हैं और जिन्हें संभावित प्रत्याशियों के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यह है कि वे अपनी चुनावी सक्रियता को किस दिशा में ले जाते हैं।
क्या वे सरकार की योजनाओं और जनसेवा पर फोकस करेंगे या संगठन के सामने विधानसभा टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूती से पेश करेंगे? इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा।
हालांकि मुख्यमंत्री या भाजपा संगठन की ओर से दायित्वधारियों को विधानसभा टिकट नहीं देने संबंधी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लिहाजा इसे टिकट पर अंतिम फैसला नहीं, बल्कि संगठनात्मक और राजनीतिक संकेत के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
फिलहाल 2027 की बढ़ती सियासी गर्मी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दायित्व की कुर्सी विधानसभा टिकट का रास्ता खोलेगी या दायित्वधारियों के लिए टिकट का संकट खड़ा करेगी?
