नैनो उर्वरक: खेती का भविष्य या नई चुनौती?
दर्पण न्यूज 24/7 से विशेष बातचीत में ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी की बीएससी एग्रीकल्चर की छात्रा कनिका बमेटा ने बताया वैज्ञानिक उपयोग से ही मिलेगा पूरा लाभ।
दर्पण न्यूज ब्यूरो देहरादून ।
सतत और पर्यावरण अनुकूल कृषि की दिशा में नैनो उर्वरक एक नई उम्मीद बनकर उभरा हैं। सरकार और कृषि वैज्ञानिक जहां इसे खेती में क्रांतिकारी तकनीक मान रहे हैं, वहीं कृषि के विद्यार्थी भी इस विषय पर गंभीर अध्ययन कर रहे हैं।
आज दर्पण न्यूज 24/7 से विशेष बातचीत के दौरान देवभूमि के ग्राफिक एरा
विश्वविद्यालय में बीएससी एग्रीकल्चर की छात्रा कनिका बमेटा ने नैनो उर्वरकों की उपयोगिता, लाभ और चुनौतियों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नैनो उर्वरक कृषि के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं, लेकिन इनका लाभ तभी मिलेगा जब किसान इनका प्रयोग वैज्ञानिक सलाह और संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ करेंगे।
कनिका बमेटा ने कहा कि वर्षों से रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई है, जल स्रोत प्रदूषित हुए हैं और पर्यावरण पर भी नकारात्मक असर पड़ा है। ऐसे में नैनो तकनीक आधारित उर्वरक एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आए हैं। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे उत्पाद पौधों द्वारा अधिक दक्षता से अवशोषित किए जाते हैं, जिससे पोषक तत्वों की बर्बादी कम होती है और उर्वरकों की उपयोग क्षमता बढ़ती है।
उन्होंने बताया कि संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने पर नैनो उर्वरक फसल की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाने, किसानों की लागत घटाने तथा मिट्टी और जल प्रदूषण कम करने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नैनो उर्वरक पारंपरिक उर्वरकों का पूर्ण विकल्प नहीं हैं। इनका उपयोग मृदा परीक्षण और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
कनिका बमेटा ने कहा कि यदि किसानों को नैनो उर्वरकों के सही उपयोग का प्रशिक्षण और वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराई जाए तो यह तकनीक भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, आधुनिक और लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
बातचीत के अंत में उन्होंने कहा, “आधुनिक तकनीक तभी सफल होती है, जब उसका उपयोग वैज्ञानिक ज्ञान, संतुलित सोच और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ किया जाए।
फोटो। कनिका बमेटा
