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आठ माह से सड़क पर नर्सिंग अभ्यर्थी, सरकार की चुप्पी के बीच चार महिलाओं ने खाया जहर!

स्वास्थ्य मंत्री के आवास के बाहर आत्महत्या के प्रयास से मचा हड़कंप, एक की हालत गंभीर, वर्षवार भर्ती की मांग पर अड़े अभ्यर्थी

सरकार के दावों पर बड़ा सवाल—आखिर आठ माह से आंदोलनरत अभ्यर्थियों से बातचीत क्यों नहीं?

देहरादून। उत्तराखंड में रोजगार और भर्ती को लेकर सरकार के तमाम दावों के बीच नर्सिंग अभ्यर्थियों का आठ माह से चला आ रहा आंदोलन बुधवार को उस समय बेहद गंभीर और चिंताजनक मोड़ पर पहुंच गया, जब स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के यमुना कॉलोनी स्थित आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान चार महिला अभ्यर्थियों ने कथित तौर पर जहरीला पदार्थ खा लिया। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। पुलिस और प्रशासन ने आनन-फानन में चारों महिलाओं को उपचार के लिए दून अस्पताल पहुंचाया। इनमें एक महिला की हालत गंभीर बताई जा रही है।

वर्षवार भर्ती प्रक्रिया शुरू करने और वरिष्ठता के आधार पर नियुक्ति की मांग को लेकर नर्सिंग अभ्यर्थी पिछले करीब आठ माह से आंदोलनरत हैं। बुधवार को बड़ी संख्या में अभ्यर्थी स्वास्थ्य मंत्री से वार्ता करने उनके आवास पहुंचे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इतने लंबे समय से आंदोलन चलने के बावजूद सरकार और विभाग की ओर से उनकी समस्या का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में गंभीर पहल नहीं की गई। अभ्यर्थियों का यह भी आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री ने अब तक उनसे सीधे संवाद तक नहीं किया।

बुधवार को मंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान अचानक चार महिला अभ्यर्थियों द्वारा जहरीला पदार्थ खाए जाने की घटना ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे और चारों महिलाओं को अस्पताल पहुंचाया गया। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।

नर्सिंग एकता मंच के अध्यक्ष नवल पुंडीर के अनुसार, आत्महत्या का प्रयास करने वाली चारों महिला अभ्यर्थियों की पहचान की जा रही है। उन्होंने बताया कि एक महिला की हालत गंभीर बताई जा रही है। संगठन के पदाधिकारी भी अस्पताल पहुंच रहे हैं और अभ्यर्थियों के स्वास्थ्य की जानकारी ले रहे हैं।

इस घटना के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री के आवास के बाहर नर्सिंग अभ्यर्थियों का धरना जारी रहा। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से तत्काल वार्ता कर वर्षवार भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की मांग दोहराई। अभ्यर्थियों का कहना है कि वे पिछले आठ माह से लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है।

एक महिला अभ्यर्थी ने कहा कि वे स्वास्थ्य मंत्री से बातचीत करने के लिए उनके आवास पहुंचे थे, लेकिन उन्हें वार्ता का अवसर नहीं मिला। उनका कहना था कि आठ माह से धरना चल रहा है, इसके बावजूद सरकार की ओर से उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

अभ्यर्थियों का कहना है कि उनकी मुख्य मांग वर्षवार यानी वरिष्ठता के आधार पर नर्सिंग भर्ती किए जाने की है। उनका आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी के कारण बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों की उम्र सरकारी नौकरी की निर्धारित सीमा के करीब पहुंच रही है। कई अभ्यर्थी मजबूरी में निजी अस्पतालों में काम कर रहे हैं और सरकारी नियुक्ति की उम्मीद में लगातार आंदोलन कर रहे हैं।

इधर, दून अस्पताल के ईएमओ डॉ. अमित अरुण ने बताया कि अस्पताल में एक महिला को जहरीला पदार्थ खाने के बाद लाया गया है। प्रारंभिक स्थिति में उसकी हालत खतरे से बाहर बताई गई है। हालांकि जांच और रिपोर्ट आने के बाद ही उसकी वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जा सकेगी।

सरकार के दावों के बीच जमीनी हकीकत ने उठाए सवाल

उत्तराखंड सरकार लगातार युवाओं को रोजगार और भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी एवं तेज बनाने के दावे करती रही है। ऐसे में आठ माह से आंदोलन कर रहे नर्सिंग अभ्यर्थियों का मामला और बुधवार को चार महिला अभ्यर्थियों के आत्महत्या के प्रयास की घटना सरकार के इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बड़ी संख्या में युवा अभ्यर्थी महीनों से अपनी मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं तो सरकार और संबंधित विभाग ने अब तक प्रभावी संवाद क्यों नहीं स्थापित किया? क्या किसी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मतभेद का समाधान बातचीत के जरिए नहीं निकाला जा सकता था? क्या आंदोलनरत अभ्यर्थियों को समय रहते वार्ता की मेज पर बुलाकर उनकी समस्याओं और आशंकाओं को दूर नहीं किया जा सकता था?

बुधवार की घटना ने यह सवाल भी सामने ला दिया है कि सरकार की कथित संवेदनशीलता और धरातल पर आंदोलन कर रहे बेरोजगार युवाओं की पीड़ा के बीच आखिर इतना बड़ा अंतर क्यों है। चार महिलाओं का कथित तौर पर जहरीला पदार्थ खाकर जान देने का प्रयास किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए गंभीर चेतावनी से कम नहीं है।

अब निगाहें सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर टिकी हैं कि वह इस घटना के बाद भी आंदोलन को महज कानून-व्यवस्था का विषय मानता है या फिर नर्सिंग अभ्यर्थियों से तत्काल संवाद स्थापित कर उनकी मांगों पर ठोस और समयबद्ध निर्णय लेता है। फिलहाल, आठ माह से जारी आंदोलन और उसके बीच सामने आई यह घटना सरकार की कार्यशैली, संवादहीनता और भर्ती व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल बनकर सामने आई है।

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