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पहाड़ का युवा पूछ रहा है—हमारे हिस्से में आखिर कब आएगा रोजगार?

दिल्ली में छात्रों पर कार्रवाई के विरोध से उत्तराखंड में गरमाई सियासत, कांग्रेस ने खोला मोर्चा, लेकिन पहाड़ के युवाओं का दर्द इससे कहीं गहरा है

दर्पण न्यूज 24×7 |

हल्द्वानी। पहाड़ का युवा आज सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा। वह अपने घर-आंगन में अपना भविष्य तलाश रहा है। वह चाहता है कि जिस पहाड़ ने उसे जन्म दिया, उसकी मिट्टी में ही उसके सपनों को उड़ान मिले। वह नहीं चाहता कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे रोजगार की तलाश में अपने गांव, अपने माता-पिता और अपनी जड़ों को छोड़कर देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, चंडीगढ़ बैंगलुरू, चेन्नई या देश के किसी अन्य महानगर की ओर पलायन करना पड़े।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार के पास उस युवा के सवालों का कोई जवाब है?

दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कथित लाठीचार्ज और कार्रवाई के विरोध में उत्तराखंड में कांग्रेस के प्रदेशभर में हुए प्रदर्शन ने एक बार फिर युवाओं के उन सवालों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है, जो लंबे समय से पहाड़ की खामोश वादियों में गूंज रहे हैं।

हल्द्वानी के स्वराज आश्रम से लेकर लालकुआं, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, बेरीनाग, गंगोलीहाट, रामनगर, रुद्रपुर, खटीमा और काशीपुर तक कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। कहीं धरना हुआ, कहीं पुतले फूंके गए, कहीं नारे लगे तो कहीं सड़क पर बैठकर विरोध दर्ज कराया गया।

कांग्रेस ने इसे छात्रों के साथ कथित बर्बरता और अपने वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध से जोड़ा है। लेकिन इन प्रदर्शनों के बीच एक बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ है—

आखिर उस पहाड़ी युवा का क्या, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है?

उस युवा का क्या, जिसके पिता खेत बेचकर या कर्ज लेकर उसकी पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं?

उस बेटी का क्या, जो सरकारी नौकरी की उम्मीद में दिन-रात किताबों के बीच अपना जीवन खपा रही है?

उस परिवार का क्या, जिसका बेटा नौकरी की तलाश में शहर गया और फिर कभी गांव लौटकर नहीं आया?

यही वह दर्द है, जो पहाड़ के लाखों युवाओं के सीने में दबा हुआ है।

पहाड़ में खाली होते घर और भरते शहर

उत्तराखंड के पहाड़ों की सबसे बड़ी त्रासदी सिर्फ बेरोजगारी नहीं है। सबसे बड़ा संकट यह है कि रोजगार की तलाश में युवा पहाड़ छोड़ रहा है।

कभी जिन गांवों में सुबह खेतों की मेड़ पर हलचल होती थी, आज वहां कई घरों के दरवाजों पर ताले लटके हैं। जिन आंगनों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा है। बूढ़े माता-पिता गांव में रह गए हैं और उनके बेटे-बेटियां नौकरी की तलाश में महानगरों की भीड़ का हिस्सा बन गए हैं।

पहाड़ का युवा पढ़ता है। सपने देखता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। वर्षों इंतजार करता है। परीक्षा देता है। फिर कभी भर्ती प्रक्रिया अटक जाती है, कभी परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, कभी परिणाम का इंतजार लंबा हो जाता है।

और इस इंतजार में उसकी उम्र निकलती जाती है।

उसके साथ उसके परिवार की उम्मीदें भी बूढ़ी होती जाती हैं।

सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, एक पूरी पीढ़ी के भविष्य का है

दिल्ली की घटना को लेकर कांग्रेस के प्रदर्शन ने भले ही राजनीतिक रंग ले लिया हो, लेकिन उत्तराखंड के संदर्भ में यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है।

यह सवाल उस पूरी पीढ़ी का है जो रोजगार के लिए संघर्ष कर रही है।

यह सवाल उस मां का है, जो अपने बेटे को हर सुबह यह कहकर उठाती है कि “मेहनत कर बेटा, एक दिन नौकरी जरूर मिलेगी।”

यह सवाल उस पिता का है, जिसने अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर बेटे को पढ़ाया और अब उसकी आंखों में नौकरी की उम्मीद देख रहा है।

यह सवाल उस बेटी का है, जो पहाड़ के छोटे से गांव से निकलकर शहर में कमरा लेकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही है और हर महीने घर से आने वाले पैसों के साथ अपने माता-पिता की मजबूरियां भी महसूस करती है।

ऐसे में जब युवा सड़क पर उतरता है तो उसकी आवाज को सिर्फ राजनीतिक नारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उस आवाज के पीछे एक परिवार का सपना होता है।

एक मां की उम्मीद होती है।

एक पिता की मेहनत होती है।

और एक पूरे पहाड़ का भविष्य होता है।

कांग्रेस के प्रदर्शन ने सरकार के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल

कांग्रेस ने दिल्ली की घटना को लेकर उत्तराखंड भर में प्रदर्शन कर सरकार को घेरने की कोशिश की है। हल्द्वानी में कांग्रेस नेताओं ने युवाओं के शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों का जवाब देने की मांग की। लालकुआं में पुतला दहन हुआ। अल्मोड़ा में सड़क पर उतरकर विरोध हुआ। पहाड़ के अन्य जिलों में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर छात्रों के समर्थन में आवाज उठाई।

लेकिन अब सवाल कांग्रेस से भी है।

क्या यह आंदोलन केवल पुतला दहन और नारेबाजी तक सीमित रहेगा?

या कांग्रेस वास्तव में पहाड़ के युवाओं के बीच जाकर उनकी पीड़ा सुनेगी?

क्योंकि पहाड़ का युवा अब सिर्फ सरकार बदलने की राजनीति नहीं चाहता। वह अपनी जिंदगी बदलने का रास्ता चाहता है।

उसे राजनीतिक भाषण नहीं, रोजगार चाहिए।

उसे आश्वासन नहीं, अवसर चाहिए।

उसे वादे नहीं, पारदर्शी भर्ती चाहिए।

उसे पलायन नहीं, अपने घर के पास सम्मानजनक भविष्य चाहिए।

सरकार के लिए भी यह चेतावनी है

इन प्रदर्शनों को सरकार के लिए एक राजनीतिक चेतावनी के रूप में भी देखा जा सकता है।

युवाओं के सवाल जितने लंबे समय तक अनुत्तरित रहेंगे, उतना ही उनके भीतर का असंतोष बढ़ेगा। यह असंतोष किसी एक दिन के आंदोलन से नहीं बना है। इसके पीछे वर्षों की बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, रोजगार के सीमित अवसर और पहाड़ से लगातार हो रहा पलायन है।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार युवाओं से सीधे संवाद करे।

उन्हें बताए कि रोजगार के कितने अवसर पैदा किए जा रहे हैं।

भर्तियों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

परीक्षाओं में अनियमितता रोकने के लिए क्या ठोस व्यवस्था है।

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पहाड़ के युवा को अपने ही पहाड़ में भविष्य बनाने का अधिकार मिल सकेगा?

2027 की राजनीति में निर्णायक हो सकता है युवा

उत्तराखंड की राजनीति अब धीरे-धीरे अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। ऐसे में युवा मतदाता और बेरोजगारी का सवाल आने वाले चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कांग्रेस के सामने अवसर है कि वह युवाओं के दर्द को सिर्फ राजनीतिक मुद्दा न बनाए, बल्कि उसे एक जनआंदोलन का स्वर दे। लेकिन इसके लिए उसे सड़क पर विरोध करने से आगे बढ़ना होगा। उसे युवाओं के बीच जाना होगा, उनकी समस्याएं सुननी होंगी और रोजगार को लेकर अपना ठोस रोडमैप सामने रखना होगा।

वहीं सरकार के सामने भी चुनौती कम नहीं है। यदि युवाओं के सवालों का समय रहते समाधान नहीं हुआ तो विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल सकता है।

पहाड़ का युवा आखिर कब तक इंतजार करेगा?

यह सवाल आज हर उस गांव में है, जहां से कोई बेटा नौकरी की तलाश में शहर गया है।

यह सवाल हर उस घर में है, जहां किसी बेटी की आंखों में सरकारी नौकरी का सपना है।

यह सवाल हर उस छात्र के मन में है, जिसने वर्षों तक किताबें पढ़ीं, परीक्षाएं दीं और फिर भी अपने भविष्य को अनिश्चित पाया।

और यह सवाल उस पहाड़ का है, जो लगातार अपने युवाओं को खो रहा है।

पहाड़ का युवा आखिर कब तक अपने भविष्य के लिए सड़कों पर संघर्ष करता रहेगा?

आखिर कब उसे अपने ही गांव में, अपने ही प्रदेश में, अपने ही घर के पास सम्मान के साथ जीने और रोजगार पाने का अवसर मिलेगा?

दिल्ली से उठी आवाज उत्तराखंड तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने उस आवाज को राजनीतिक मंच दिया है। अब देखना यह है कि यह आवाज कितनी दूर तक जाती है।

क्योंकि पहाड़ का युवा अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि सरकार कौन बनाएगा?

वह पूछ रहा है—

“सरकार कोई भी बनाए, लेकिन हमारे लिए बनाएगी क्या?”

और शायद यही सवाल आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बनने जा रहा है।

क्योंकि जिस दिन पहाड़ का युवा अपने सवालों का जवाब मांगने के लिए सिर्फ शहरों की सड़कों पर नहीं, बल्कि अपने गांवों से एकजुट होकर आवाज उठाएगा, उस दिन यह आवाज किसी एक राजनीतिक दल की नहीं होगी—यह पूरे पहाड़ की आवाज होगी।

 

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