खबरें शेयर करें -

प्रदेश में गैस सप्लाई के दावों के बीच हकीकत अलग: मुख्य सचिव सख्त, जिलों से तलब रिपोर्ट!
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7
देहरादून। प्रदेश में रसोई गैस संकट को लेकर बढ़ती शिकायतों के बीच शासन स्तर पर हलचल तेज हो गई है। मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने सोमवार को सचिवालय से सभी जिलाधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर एलपीजी गैस की उपलब्धता की समीक्षा की और स्पष्ट निर्देश दिए कि घरेलू व व्यवसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति किसी भी हाल में बाधित नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने जिलावार स्थिति का ब्यौरा तलब करते हुए कहा कि उपभोक्ताओं के साथ-साथ अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य जरूरी सेवाओं को निर्बाध गैस उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। सभी जिलाधिकारियों को एलपीजी स्टेट कॉर्डिनेटर से लगातार समन्वय बनाकर आपूर्ति बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए।
मुख्य सचिव ने ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में बदले इलाकों को तेल कंपनियों के सिस्टम में अपडेट करने, साथ ही पीएनजी कनेक्शन को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने व्यावसायिक संस्थानों को पाइप्ड गैस अपनाने के लिए प्रेरित करने और वैकल्पिक ईंधन के रूप में पिरुल ब्रिकेट को बढ़ावा देने की भी बात कही, जिससे एलपीजी पर निर्भरता कम हो सके।
कागजों में ‘सप्लाई दुरुस्त’, जमीन पर उपभोक्ता बेहाल
हालांकि शासन के इन दावों के उलट जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। प्रदेश के कई जिलों में उपभोक्ता गैस सिलेंडर के लिए भटक रहे हैं। बुकिंग के बाद लंबा इंतजार, एजेंसियों की मनमानी और फोन तक न उठाने की शिकायतें आम हो चुकी हैं।
ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्थिति और गंभीर है, जहां कई दिनों तक गैस उपलब्ध नहीं हो पा रही। उपभोक्ताओं का आरोप है कि प्रशासन की निगरानी केवल कागजों तक सीमित है, जबकि धरातल पर व्यवस्था चरमरा चुकी है।
प्रशासन सख्त, लेकिन चुनौती बड़ी!
शासन स्तर पर सख्ती और निर्देशों के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती आपूर्ति व्यवस्था को वास्तव में पटरी पर लाना है। अब देखना होगा कि मुख्य सचिव के निर्देशों के बाद जिलों में हालात सुधरते हैं या फिर ‘कागजी दावे’ और ‘जमीनी सच्चाई’ के बीच का अंतर यूं ही बना रहता है।

उत्तराखंड