“चुप्पी टूटी, जनआक्रोश फूटा” अल्मोड़ा से उठी आवाज मजदूर शोषण, लोकतंत्र पर सवाल और संघर्ष का बिगुल!
दर्पण न्यूज 24/7 अल्मोड़ा। उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों में इस बार आवाज कुछ अलग थी तेज, तल्ख और सवालों से भरी। 33वें उमेश डोभाल स्मृति सम्मान समारोह के प्रथम दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी जनाक्रोश के मंच में तब्दील हो गई, जहां मजदूर शोषण, लोकतंत्र की गिरती साख और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों को लेकर वक्ताओं ने सत्ता और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया।
वरिष्ठ चिंतक पी सी तिवारी ने सीधे सवाल दागे “जब मेहनतकश वर्ग बदहाल है, तो विकास किसका हो रहा है?” उन्होंने कहा कि समाज का सबसे बड़ा संकट यह है कि हम सच्चाई से आंख चुरा रहे हैं। उन्होंने चेताया कि केवल भाषणों से नहीं, बल्कि जमीनी संघर्ष से ही बदलाव संभव है।
औद्योगिक विकास के नाम पर हो रहे शोषण को उजागर करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड में रोजगार का सपना ठेका प्रथा में कैद होकर रह गया है। हजारों युवा स्थायी नौकरी के बजाय अस्थायी, कम वेतन और असुरक्षित काम में धकेले गए हैं। श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, लेकिन जिम्मेदार संस्थाएं मौन हैं।
लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति पर भी करारा प्रहार हुआ। वक्ताओं ने कहा कि आज फैसले जनता के बीच नहीं, बल्कि सत्ता के बंद कमरों में तय होते हैं। बिना जनसहमति फैसले थोपे जा रहे हैं। “क्या यही लोकतंत्र है?” यह सवाल बार-बार गूंजता रहा। राइट टू रिकॉल और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग को जनतांत्रिक सुधार की दिशा में जरूरी बताया गया।
वरिष्ठ पत्रकार ईश्वर दत्त जोशी ने पहाड़ की सच्चाई सामने रखते हुए कहा—“गांव खाली हो रहे हैं, खेत उजड़ रहे हैं और लोग अपने ही घर से दूर होते जा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि नीतियों का असर कागजों में है, जमीन पर नहीं।
गोष्ठी में चारु तिवारी ने लोकतंत्र की संरचना पर गहरी चोट करते हुए कहा कि आज व्यवस्था “जनभागीदारी” से दूर होती जा रही है। उन्होंने चुनाव प्रणाली की खामियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि मौजूदा ढांचा आम जनता की वास्तविक आवाज को सीमित कर रहा है और इसे बदलना समय की मांग है।
कार्यक्रम का सबसे जोशीला क्षण तब आया जब जनकवि बल्ली सिंह चीमा की पंक्तियां गूंज उठीं—
“जिंदा है तो सड़कों पर आ, संघर्षों में शामिल हो…”
इन शब्दों ने पूरे सभागार को एकजुटता और प्रतिरोध के संकल्प में बदल दिया।
बाजपुर के पत्रकार विमल भारती के साथ हुए कथित अत्याचार का मुद्दा भी केंद्र में रहा। वक्ताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताते हुए कहा कि अगर पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रह सकता।
उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविंद पंत राजू ने कहा कि यह मंच केवल सम्मान का नहीं, बल्कि समाज को जगाने का मंच है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—“अब वक्त समझौते का नहीं, सच के साथ खड़े होने का है।”
गोष्ठी में बार-बार यह स्वर उभरा कि सत्ता और पूंजी का गठजोड़ लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है और आम जनता को हाशिये पर धकेला जा रहा है। शराब माफिया से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों तक—हर जगह जनहित पीछे छूटता दिख रहा है।
समापन में एकजुट स्वर में हुंकार गूंजी—
“अब खामोशी नहीं—सड़कों पर संघर्ष ही बदलाव का रास्ता है।”
अल्मोड़ा से उठी यह आवाज सिर्फ एक गोष्ठी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह संकेत दे गई कि देशभर में सुलग रहा जनआक्रोश अब खुलकर सामने आने को तैयार है।
कार्यक्रम में विभिन्न जिलों के पत्रकार साहित्यकार शामिल ए

