विकास पुरुष का गांव हो या सीमांत बस्तियां—एआई के दौर में अब भी कंधों पर चलती है जिंदगी!
प्रमोद बमेटा ब्यूरोचीफ दर्पण न्यूज 24/7 उत्तराखंड!
उत्तराखंड के जननायक, विकास पुरुष स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी का पदमपुरी के समीप स्थित पैतृक गांव कुरई बमेटा आज भी सड़क से वंचित है। उधर सीमांत पिथौरागढ़ के मुनस्यारी का गांधीनगर गांव हो या उत्तरकाशी के पंचगांई की पट्टी सावणी और सटूड़ी—इन सबकी पीड़ा एक सी है। एआई और डिजिटल इंडिया के शोर के बीच पहाड़ के ये गांव अब भी सड़क, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। तस्वीरें ऐसी, मानो विकास की गाड़ी यहां पहुंचने से पहले ही थम गई हो।
कंधों पर अस्पताल का सफर!
मुनस्यारी ब्लॉक के गांधीनगर गांव में 50 वर्षीय सरुली देवी के पेट में अचानक तेज दर्द उठा। गांव में प्राथमिक उपचार की भी सुविधा नहीं। ऐसे में ग्रामीणों ने डोली तैयार की और करीब 10 किलोमीटर तक उबड़-खाबड़ रास्तों से कंधों पर उठाकर सड़क तक पहुंचाया। वहां से मदकोट के रास्ते स्वास्थ्य केंद्र और फिर जिला अस्पताल ले जाया गया।
कंधों पर चलती यह डोली सिर्फ एक महिला का संघर्ष नहीं थी, बल्कि उस सिस्टम का आईना थी जहां आज भी एंबुलेंस से पहले इंसानी कंधे पहुंचते हैं।
गांधीनगर गांव, जहां करीब 250 परिवार रहते हैं, आजादी के सात दशक बाद भी सड़क से नहीं जुड़ पाया। ग्राम प्रधान और स्थानीय जनप्रतिनिधि वर्षों से सड़क की मांग उठा रहे हैं, लेकिन फाइलों से आगे मामला नहीं बढ़ पा रहा।
घोषणा हुई, सड़क नहीं बनी!
उत्तरकाशी जिले के सावणी और सटूड़ी गांवों के 72 परिवार हर साल बरसात में रूपिन नदी पर बनी जर्जर लकड़ी की पुलिया के भरोसे रहते हैं। वर्ष 2018 में खेड़ा से सटूड़ी-सांवणी तक पांच किलोमीटर मोटर मार्ग निर्माण की घोषणा हुई। सर्वे हुआ, भूमि प्रतिकर भी वितरित हुआ, लेकिन निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका।
ग्रामीणों के अलग-अलग सुझावों के बीच प्राक्कलन शासन को भेजा गया है, पर पहाड़ पूछ रहा है—क्या सड़कें सिर्फ कागजों पर ही बनेंगी?
विडंबना का सबसे तीखा प्रश्न!
सबसे बड़ा सवाल कुरई बमेटा गांव को लेकर है—वही गांव जो विकास पुरुष नारायण दत्त तिवारी की जन्मभूमि है। जिस नेता ने उत्तराखंड को औद्योगिक पहचान दी, उनके अपने गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई।
यह विडंबना पहाड़ की नियति बन चुकी है—
घोषणाएं ऊंची, हकीकत नीची।
भाषण बड़े, रास्ते छोटे।
एआई बनाम असली भारत
देश एआई, ड्रोन तकनीक, डिजिटल हेल्थ मिशन और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की बात कर रहा है। लेकिन पहाड़ के इन गांवों में आज भी डंडी-कंडी एंबुलेंस है, लकड़ी की पुलिया जीवनरेखा है और पगडंडी ही राजमार्ग है।
सरकार को तय करना होगा—
क्या पहाड़ सिर्फ पर्यटन पोस्टरों तक सीमित रहेंगे,
या यहां के लोगों की सांसों को भी प्राथमिकता मिलेगी?
अगर अब भी सड़कों की फाइलें दफ्तरों में अटकी रहीं,
तो इतिहास दर्ज करेगा—
एआई के युग में भी उत्तराखंड के पहाड़ों में जिंदगी कंधों पर चलती रही।
