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तराई के जंगलों पर साया: साजिशों की आहट, वन महकमे को चेतावनी!
दर्पण न्यूज 24/7 लालकुआं।
तराई केंद्रीय वन प्रभाग के घने जंगलों की खामोशी इन दिनों कुछ सवाल पूछ रही है। पेड़ों की सरसराहट जैसे फुसफुसा कर कह रही हो—
“कहीं फिर से कोई कुल्हाड़ी तो नहीं उठ रही?”
सूत्र बताते हैं कि तराई के हरियाले दामन को खुर्दबुर्द करने की नई साजिशें परवान चढ़ाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। सत्ता के करीब माने जाने वाले कुछ प्रभावशाली लोग सत्ताधारी नेताओं की सिफारिशों का सहारा लेकर वन विभाग के अधिकारियों पर दबाव बनाने की जुगत में बताए जा रहे हैं।
जंगल की राह पकड़ने वाले ये लोग पहले सत्ता के गलियारों में रिश्ते मजबूत कर रहे हैं, फिर उन्हीं संबंधों की आड़ में वन क्षेत्रों में अपने चहेतों को मनमाफिक काम दिलाने और प्रतिबंधित इलाकों में घुसपैठ के रास्ते तलाशने में जुटे हैं।
कहते हैं कि—
“जंगल काटने से पहले लोग कानून नहीं, रास्ते तलाशते हैं।”
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में ऐसा ही एक प्रयास उस वक्त नाकाम हुआ जब शीर्ष वन अधिकारियों को मिली एक गोपनीय शिकायत के आधार पर तराई केंद्रीय वन क्षेत्र के पीपल पड़ाव और भाखड़ा क्षेत्र में लकड़ी से भरी ट्रॉली को जंगल से बाहर ले जाने की कोशिश पकड़ ली गई।
हालांकि यह भी चर्चा है कि कथित प्रभावशाली हस्तक्षेप के चलते मामला फाइलों की औपचारिक लिखापढ़ी तक नहीं पहुंच सका। यानी जंगल बचाने की कोशिश हुई जरूर, लेकिन कार्रवाई की धार कहीं न कहीं कुंद कर दी गई।
अब खबर है कि ऐसे तत्व तराई पश्चिमी वन क्षेत्र की ओर भी नजरें गड़ाए हुए हैं। जंगल की जमीन, लकड़ी और संसाधनों पर कब्जे की यह धीमी चाल कहीं बड़े खेल की आहट मानी जा रही है।
वन एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने इस पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है—
“अगर अभी आंखें बंद रहीं तो कल जंगलों की हरियाली सिर्फ तस्वीरों में रह जाएगी।”
ऐसे में वन विभाग के लिए भी यह वक्त एक चेतावनी की तरह है। क्योंकि तराई के ये जंगल सिर्फ पेड़ों का झुंड नहीं, बल्कि प्रकृति की धड़कन हैं।
और याद रखना होगा—
“जब जंगल कटते हैं तो सिर्फ लकड़ी नहीं गिरती, आने वाली पीढ़ियों की सांसें भी कम हो जाती हैं।”

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