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पहाड़ों में इंसान असुरक्षित, जंगल का राजा आबादी में बेखौफ! आखिर कब जागेगा प्रशासन?
रानीखेत में युवती पर बाघ का हमला बना एक और चेतावनी, मानव-वन्यजीव संघर्ष पर सरकारी दावों की खुली पोल।
दर्पण न्यूज 24/7 | संवाददाता: गोपाल नाथ गोस्वामी
रानीखेत (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब भयावह रूप ले चुका है। ताजा मामला रानीखेत क्षेत्र के ऐना गांव का है, जहां सोमवार शाम करीब साढ़े तीन बजे 22 वर्षीय युवती पर बाघ ने उस समय हमला कर दिया, जब वह गांव के स्कूल के समीप स्थित छोटे मंदिर के पास मौजूद थी। बाघ के हमले में युवती गंभीर रूप से घायल हो गई। ग्रामीणों के शोर मचाने पर बाघ जंगल की ओर भागा, लेकिन इस घटना ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी।
घायल युवती को पहले राजकीय चिकित्सालय रानीखेत ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद सिर में गंभीर चोट और न्यूरो सर्जन उपलब्ध न होने के कारण उसे हल्द्वानी रेफर करना पड़ा। परिजन निजी एंबुलेंस से उसे हल्द्वानी ले गए। तहसीलदार दीपिका आर्य ने अस्पताल और घटनास्थल का निरीक्षण किया, जबकि ग्रामीणों ने वन विभाग से तत्काल प्रभावी कार्रवाई की मांग की है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर बार किसी के घायल या मौत का इंतजार करना ही प्रशासन की कार्यशैली बन चुकी है?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आए दिन बाघ, गुलदार, भालू और जंगली सूअर आबादी तक पहुंच रहे हैं। खेत, स्कूल, मंदिर, घरों के आसपास तक वन्यजीवों की मौजूदगी अब सामान्य होती जा रही है। इसके बावजूद वन विभाग और प्रशासन की ओर से स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नजर नहीं आते।
वन्यजीवों की गतिविधियों पर निगरानी, संवेदनशील गांवों में गश्त, त्वरित रेस्क्यू टीम, कैमरा ट्रैप, चेतावनी प्रणाली और ग्रामीणों को समय पर अलर्ट करने जैसी व्यवस्थाएं आज भी कई क्षेत्रों में केवल कागजों तक सीमित हैं। नतीजा यह है कि पहाड़ का आम नागरिक हर दिन जान जोखिम में डालकर अपने खेत, स्कूल और रोजमर्रा के कार्यों के लिए घर से निकलने को मजबूर है।
प्रदेश सरकार लगातार वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण के दावे करती है, लेकिन यदि इंसान ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो विकास और संरक्षण के इन दावों का क्या अर्थ रह जाएगा? मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और वन विभाग की संयुक्त जिम्मेदारी है। केवल मुआवजा देना समस्या का समाधान नहीं है।
जनता पूछ रही है…
आखिर आबादी में लगातार पहुंच रहे बाघों और गुलदारों को रोकने की प्रभावी योजना कहां है?
संवेदनशील गांवों में स्थायी निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही?
क्या वन विभाग केवल घटनाओं के बाद औपचारिक कार्रवाई तक ही सीमित रहेगा?
पहाड़ के लोगों की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिकता कब बनेगी?
क्या हर नई घटना के बाद सिर्फ जांच, मुआवजा और आश्वासन ही मिलता रहेगा?
रानीखेत की यह घटना केवल एक युवती पर हमला नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जो वर्षों से बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान खोजने में असफल दिखाई दे रही है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में ऐसे हादसे और भी भयावह रूप ले सकते हैं।
— दर्पण न्यूज 24/7 | संवाददाता: गोपाल नाथ गोस्वामी

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