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तंज था दिल्ली के लिए, असर देहरादून तक कर गया
‘देर आए, दुरुस्त आए’ के बहाने सत्ता, शासन और आम आदमी की पहुंच पर एक जरूरी सवाल?
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून।
मुरली मनोहर जोशी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर कहा—‘देर आए, दुरुस्त आए।’ टिप्पणी का संदर्भ दिल्ली की राजनीति था। निशाना भी केंद्र से जुड़ा एक राजनीतिक घटनाक्रम था। इसलिए इस टिप्पणी को सीधे उत्तराखंड की राजनीति से जोड़ना न तो उचित होगा और न ही इसका कोई आधार है। फिर भी राजनीति में कुछ वाक्य अपने तत्काल संदर्भ से आगे जाकर व्यापक सवाल खड़े कर देते हैं। जोशी का यह संक्षिप्त वाक्य भी ऐसा ही है।
‘देर आए, दुरुस्त आए’ को यदि शासन और लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी पर पढ़ें तो सवाल केवल दिल्ली का नहीं रह जाता। तब यह सवाल हर उस सरकार के सामने खड़ा होता है जो जनता से समय पर निर्णय, संवेदनशील प्रशासन और प्रभावी शासन का वादा करती है। इसी अर्थ में यह टिप्पणी उत्तराखंड के लिए भी आत्ममंथन का एक अवसर बन सकती है।
राज्य गठन के पच्चीस वर्ष से अधिक समय बाद उत्तराखंड ने निस्संदेह विकास की लंबी यात्रा तय की है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अनेक काम हुए हैं। लेकिन दूसरी ओर पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, पहाड़ों में शिक्षा, आपदा प्रबंधन, सड़क सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे सवाल अब भी राज्य की प्राथमिक चुनौतियों में हैं। इन समस्याओं पर सरकारें काम करती रही हैं, योजनाएं बनती रही हैं और घोषणाएं भी होती रही हैं। फिर भी कई मामलों में जनता को परिणाम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या शासन की गति जनता की जरूरतों के अनुरूप है?
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितनी घोषणाएं कीं या कितनी बैठकें कीं। असली कसौटी यह है कि उसके फैसलों का असर आम नागरिक के जीवन में कितनी जल्दी और कितनी स्पष्टता से दिखाई देता है।
उत्तराखंड में आज एक चर्चा यह भी है कि आम नागरिक की सत्ता के शीर्ष तक पहुंच आसान नहीं रही। मुख्यमंत्री से मिलने के लिए सामान्य व्यक्ति को कई स्तरों से गुजरना पड़ता है। मुलाकात हो भी जाए तो उसके बाद समस्या के समाधान की राह अलग चुनौती बन जाती है। दूसरी ओर, सत्ता और शासन के गलियारों में प्रभाव रखने वाले लोगों की शीर्ष स्तर तक पहुंच अपेक्षाकृत सहज होने की चर्चाएं भी सुनाई देती हैं।
इन चर्चाओं की सत्यता का स्वतंत्र मूल्यांकन अलग विषय है। लेकिन लोकतंत्र में ऐसी धारणा का बनना भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि सत्ता के दरवाजे खुले हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या वे दरवाजे हर नागरिक के लिए समान रूप से खुले हैं?
मुख्यमंत्री पूरे राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं। कैबिनेट मंत्री पूरे प्रदेश के शासन का हिस्सा होते हैं और विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र के हर नागरिक के प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए आम नागरिक की पहुंच को केवल मुलाकात तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। असली पहुंच तब मानी जाएगी, जब किसी नागरिक की समस्या को सुनने के बाद शासन तंत्र उसके समाधान तक भी पहुंचे।
यहीं से एक और सवाल सामने आता है—क्या निर्वाचित नेतृत्व के निर्देश प्रशासनिक तंत्र तक पहुंचने के बाद उसी प्रभाव के साथ जमीन पर उतरते हैं?
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा समय-समय पर सुनाई देती है कि मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक जनसमस्याओं को लेकर अधिकारियों को निर्देश देते हैं, लेकिन कई मामलों में उन निर्देशों के अपेक्षित परिणाम सामने आने में लंबा समय लग जाता है। शिकायतकर्ता को फिर विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और उसे यह पता नहीं चलता कि उसकी समस्या किस स्तर पर अटकी हुई है।
यहां सावधानी जरूरी है। हर निर्देश का पालन तत्काल संभव नहीं होता। प्रशासन कानून, नियम और वित्तीय प्रक्रियाओं के तहत काम करता है। कई मामलों में निर्णय लेने से पहले कानूनी और तकनीकी पहलुओं की जांच आवश्यक होती है। इसलिए हर देरी को अफसरशाही की मनमानी कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि प्रक्रिया और देरी के बीच एक स्पष्ट अंतर होना चाहिए। नियमों का पालन सुशासन की आवश्यकता है, लेकिन नियमों की आड़ में जनसमस्याओं का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना सुशासन नहीं कहा जा सकता।
यदि किसी जनसमस्या पर मुख्यमंत्री, मंत्री या विधायक की ओर से नियमसम्मत और जनहितकारी निर्देश दिए गए हैं, तो उनके अनुपालन की समयबद्ध निगरानी भी होनी चाहिए। आखिर निर्देश जारी होना समाधान नहीं है। समाधान तब है, जब उसका परिणाम उस नागरिक तक पहुंचे जिसने अपनी समस्या उठाई थी।
यही वह बिंदु है जहां उत्तराखंड में अफसरशाही को लेकर चल रही चर्चाओं को समझने की जरूरत है।
अधिकारी शासन व्यवस्था की अनिवार्य कड़ी हैं। वे सरकार की नीतियों को लागू करते हैं और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखते हैं। निर्वाचित सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन प्रशासनिक तंत्र शासन को निरंतरता देता है। इसलिए एक सक्षम और निष्पक्ष नौकरशाही लोकतंत्र की ताकत है।
लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती का अर्थ यह नहीं कि निर्वाचित नेतृत्व की जवाबदेही कमजोर हो जाए। लोकतंत्र में नीति और राजनीतिक प्राथमिकताएं निर्वाचित सरकार तय करती है और प्रशासन उन नीतियों को नियमों के अनुरूप लागू करता है। दोनों के बीच संतुलन बिगड़ने पर शासन की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
इसलिए बहस ‘अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधि’ की नहीं होनी चाहिए। असली बहस जवाबदेही बनाम देरी की होनी चाहिए।
यदि कोई निर्णय नियमों के कारण लंबित है, तो उसकी वजह स्पष्ट होनी चाहिए। यदि किसी निर्देश पर कार्रवाई संभव नहीं है, तो संबंधित अधिकारी को कारण बताना चाहिए। यदि कार्रवाई संभव है, तो उसकी समयसीमा तय होनी चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, शिकायतकर्ता को यह पता होना चाहिए कि उसकी समस्या का अगला पड़ाव क्या है।
तकनीक के इस दौर में यह व्यवस्था बनाना कठिन नहीं है। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के स्तर से उठाई गई जनसमस्याओं की डिजिटल निगरानी की जा सकती है। प्रत्येक मामले के लिए समयसीमा तय की जा सकती है। कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की जा सकती है। इससे न केवल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि जनप्रतिनिधियों की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
क्योंकि जनता अंततः परिणाम देखती है।
उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी सड़क की फाइल किस मेज पर रुकी है। वह यह देखती है कि सड़क बनी या नहीं। मरीज यह देखता है कि उसे समय पर इलाज मिला या नहीं। युवा यह देखता है कि रोजगार का अवसर मिला या नहीं। किसान यह देखता है कि उसकी समस्या का समाधान हुआ या नहीं। वन्यजीव प्रभावित गांव का परिवार यह देखता है कि उसे सुरक्षा मिली या नहीं।
यही शासन की वास्तविक कसौटी है।
मुरली मनोहर जोशी का ‘देर आए, दुरुस्त आए’ इसी कसौटी की याद दिलाता है। लोकतंत्र में देर से लिया गया सही निर्णय निश्चित रूप से गलत निर्णय से बेहतर है, लेकिन सुशासन की असली पहचान यह है कि सही निर्णय समय पर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी समय पर हो।
उत्तराखंड को आज इसी समयबद्ध शासन की जरूरत है।
आम आदमी को मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए प्रभाव और पहचान की जरूरत महसूस न हो। मंत्री और विधायक जब किसी जनसमस्या को उठाएं तो उसे केवल एक पत्राचार न समझा जाए। अधिकारी नियमों के भीतर रहते हुए निर्णय लें और यदि किसी निर्णय में बाधा हो तो उसकी वजह स्पष्ट करें। सरकार यह सुनिश्चित करे कि प्रशासनिक प्रक्रिया जनहित का साधन बने, समस्या को टालने का माध्यम नहीं।
यह भी उतना ही जरूरी है कि सरकार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच बेहतर संवाद की व्यवस्था बनाए। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और अधिकारी—सभी की भूमिका अलग है, लेकिन लक्ष्य एक ही होना चाहिए: जनता को समय पर न्याय और सुविधाएं उपलब्ध कराना।
मुरली मनोहर जोशी का तंज दिल्ली के लिए था। उसका उत्तराखंड से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं। लेकिन लोकतंत्र में जवाबदेही, समयबद्ध निर्णय और जनता की पहुंच का सवाल सार्वभौमिक है। इसलिए उस टिप्पणी से देहरादून में आत्ममंथन की चर्चा उठती है तो इसे किसी राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ आरोप के रूप में नहीं, बल्कि शासन को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
आखिर लोकतंत्र की असली शक्ति यह नहीं कि सत्ता तक पहुंच रखने वाले कितने लोग अपनी बात कह सकते हैं। उसकी असली शक्ति यह है कि एक सामान्य नागरिक भी बिना किसी प्रभाव और सिफारिश के अपनी बात सत्ता तक पहुंचा सके और उसे समय पर न्याय मिल सके।
जोशी ने दिल्ली की राजनीति पर तंज किया था। लेकिन उस तंज की गूंज देहरादून तक सुनाई दे तो शायद इसे एक चेतावनी की तरह नहीं, एक अवसर की तरह लिया जाना चाहिए।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि सत्ता में कौन है। सवाल यह है कि सत्ता आम आदमी तक कितनी पहुंचती है।
और यही किसी भी लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी कसौटी है।

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