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लालकुआं 2027: भाजपा में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त, किस चेहरे पर लगेगा कमल का दांव?
एंटी इनकंबेंसी, अनुभव, जनाधार, संगठन, युवा नेतृत्व, महिला कार्ड और सामाजिक समीकरणों के बीच उलझा टिकट का गणित!
दर्पण न्यूज 24/7 लालकुआं।

विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हों, लेकिन लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मियां अभी से तेज होने लगी हैं। भाजपा के भीतर संभावित दावेदारों की लंबी सूची ने पार्टी नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। मौजूदा विधायक डॉ मोहन सिंह बिष्ट, पूर्व विधायक नवीन दुम्का, जनाधार के मामले में मजबूत बताए जा रहे  कमलेश चंदोला, संगठन के मजबूत चेहरे उमेश शर्मा, युवा नेता दीपेंद्र कोश्यारी, महिला नेतृत्व की संभावित दावेदार आनंदी गड़िया और ओबीसी मोर्चा के प्रदेश मंत्री देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’ के नाम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
मोहन सिंह बिष्ट: सत्ता का लाभ, लेकिन एंटी इनकंबेंसी की चुनौती वर्तमान विधायक होने के कारण डॉ मोहन सिंह बिष्ट स्वाभाविक रूप से मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। उनके समर्थक विकास कार्यों और क्षेत्र में सक्रियता को उनकी सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। हालांकि राजनीति में लंबे समय तक सत्ता के साथ एंटी इनकंबेंसी भी जुड़ जाती है। क्षेत्र में कुछ स्थानों पर स्थानीय अपेक्षाओं और जनसमस्याओं को लेकर उठ रहे सवाल भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं।
नवीन दुम्का: अनुभव और विश्वसनीयता का चेहरा
पूर्व विधायक नवीन दुम्का आज भी भाजपा के अनुभवी और सम्मानित नेताओं में गिने जाते हैं। उनकी सादगीपूर्ण छवि, पुराने कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ और लंबे राजनीतिक अनुभव को उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। यदि पार्टी अनुभवी और सुरक्षित विकल्प की तलाश करती है तो दुम्का का दावा मजबूत रह सकता है।
कमलेश चंदोला: जनता के बीच मजबूत स्वीकार्यता
कमलेश चंदोला की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी है जिनकी आम जनता के बीच अच्छी पकड़ मानी जाती है। सामाजिक गतिविधियों और क्षेत्रीय मुद्दों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया है। यदि भाजपा स्थानीय जनाधार और लोकप्रियता को महत्व देती है तो उनका नाम भी प्रमुख दावेदारों में शामिल रहेगा।
उमेश शर्मा: संगठन का भरोसेमंद सिपाही
उमेश शर्मा की सबसे बड़ी ताकत भाजपा संगठन में उनकी मजबूत पकड़ और वर्षों की सक्रियता है। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता उन्हें टिकट की दौड़ में महत्वपूर्ण बनाती है। भाजपा की राजनीति में संगठन की राय हमेशा निर्णायक भूमिका निभाती रही है, ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
दीपेंद्र कोश्यारी: राजनीतिक विरासत के साथ नई पीढ़ी के उभरते नेताओं में दीपेंद्र कोश्यारी का नाम तेजी से आगे बढ़ रहा है। वे भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के भतीजे हैं, जिससे यदि पैराशूट फैक्टर बेअसर रहा तो उन्हें राजनीतिक विरासत का लाभ भी मिलता दिखाई देता है।भगत सिंह कोश्यारी की मजबूत पैरवी से उनका दावा मजबूत हो सकता है।
आनंदी गड़िया: महिला कार्ड का बड़ा दांव?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करती है तो आनंदी गड़िया का नाम अचानक मजबूत होकर उभर सकता है। भाजपा सरकार और संगठन द्वारा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने और भाजपा के नारी शक्ति सशक्तिकरण अभियानों के बीच पार्टी महिला चेहरे पर दांव खेल सकती है। महिला मतदाताओं के बीच सकारात्मक संदेश देने के लिहाज से भी उनका नाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’: जमीनी कार्यकर्ता और ओबीसी समीकरण का मजबूत चेहरा
भाजपा के संभावित दावेदारों में देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’ का नाम भी तेजी से चर्चा में है। वर्तमान में भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश मंत्री के रूप में कार्यरत देबू को संगठन का समर्पित और जमीनी कार्यकर्ता माना जाता है। लंबे समय से क्षेत्रवासियों की मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय रहते हुए वे केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनकी सक्रियता, कार्यकर्ताओं से मजबूत संवाद और ओबीसी वर्ग में उनकी स्वीकार्यता उन्हें एक अलग पहचान देती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा संगठननिष्ठ और सामाजिक समीकरणों को साधने वाले चेहरे की तलाश करती है तो देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’ भी मजबूत दावेदार के रूप में उभर सकते हैं।
भाजपा के सामने सबसे कठिन फैसला
लालकुआं में भाजपा के पास विकल्पों की कमी नहीं है। एक ओर मौजूदा विधायक का अनुभव है तो दूसरी ओर पूर्व विधायक की विश्वसनीयता। कहीं जनता के बीच मजबूत पकड़ है तो कहीं संगठन का दम। युवा नेतृत्व का विकल्प भी मौजूद है, महिला कार्ड भी और सामाजिक समीकरणों को साधने वाले चेहरे भी।
ऐसे में 2027 का टिकट केवल एक प्रत्याशी का चयन नहीं होगा, बल्कि भाजपा की भावी रणनीति, संगठन की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों का प्रतिबिंब भी होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या भाजपा एंटी इनकंबेंसी के बावजूद डॉ मोहन सिंह बिष्ट पर भरोसा जताएगी, अनुभव के नाम पर नवीन दुम्का को मौका देगी, जनता की पसंद को महत्व देगी, संगठन के चेहरे पर दांव लगाएगी, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाएगी, महिला कार्ड खेलेगी या फिर ओबीसी और जमीनी कार्यकर्ता के रूप में देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’ पर भरोसा जताएगी?
लालकुआं की राजनीति में इसका जवाब ही आने वाले समय की सबसे दिलचस्प चुनावी कहानी लिखेगा।

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