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फिर लाल हुआ एनएच 109, कब टूटेगी नेताओं की नींद ?

बेरीपड़ाव में तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने 55 वर्षीय चौकीदार को कुचला, एसटीएच में मौत, लगातार हादसों के बीच जनप्रतिनिधियों और 2027 के दावेदारों से जनता का सीधा सवाल।

लालकुआं। गोरापड़ाव से हल्दूचौड़ के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर शनिवार को एक बार फिर हादसे ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया। बेरीपड़ाव स्थित अष्टादश भुजा महालक्ष्मी मंदिर के समीप सड़क पार कर रहे 55 वर्षीय किशन चौधरी को लालकुआं से हल्द्वानी की ओर जा रहे तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने जोरदार टक्कर मार दी। गंभीर रूप से घायल किशन को 108 सेवा से डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय हल्द्वानी ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

नेपाल निवासी किशन चौधरी लंबे समय से मोटाहल्दू स्थित विनोद स्टोन क्रेशर में चौकीदार के रूप में कार्यरत थे और अपने बेटे के साथ रहकर परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। हादसे के बाद परिवार में कोहराम मचा है। पुलिस ने अज्ञात वाहन की तलाश शुरू कर दी है और घटनास्थल व आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है।

किशन चौधरी की मौत कोई अकेली घटना नहीं है। गोरापड़ाव से हल्दूचौड़ के बीच हाईवे पर लगातार हो रहे हादसों ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर दुर्घटना के बाद पुलिस कार्रवाई होती है, घायल अस्पताल पहुंचते हैं, अज्ञात वाहन की तलाश शुरू होती है और कुछ दिन बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। लेकिन सड़क पर खतरा जस का तस बना रहता है।

अब स्थानीय लोगों का सवाल सीधे जनप्रतिनिधियों से है । लालकुआं विधानसभा में 2027 को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। पूर्व विधायक नवीन दुमका, वर्तमान विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट, प्रबल दावेदार भाजयुमो प्रदेश महामंत्री दीपेंद्र कोश्यारी, राज्य आंदोलनकारी उमेश शर्मा, जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि कमलेश चंदोला और हिंदूवादी नेता कमल मुनि समेत कई नाम राजनीतिक चर्चाओं में हैं। जनता पूछ रही है कि जब विधायक बनने की तैयारियां और राजनीतिक सक्रियता दिखाई दे रही है तो लगातार जानलेवा साबित हो रहे हाईवे की सुरक्षा का मुद्दा इतनी मजबूती से क्यों नहीं उठ रहा?

मौजूदा विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट से यह सवाल इसलिए भी सीधे जुड़ता है क्योंकि क्षेत्र की जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है। लोगों का कहना है कि सरकार के स्तर पर पैरवी अपनी जगह है, लेकिन यदि लगातार हादसे हो रहे हैं तो संबंधित विभागों पर सार्वजनिक दबाव बनाने की जरूरत भी है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं के लिए अपनी ही सरकार और सरकारी तंत्र के खिलाफ खुलकर धरना-प्रदर्शन करना राजनीतिक रूप से असहज हो सकता है। हालांकि इस चर्चा की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

लेकिन जनता के लिए सवाल राजनीतिक सुविधा का नहीं, जिंदगी का है। सड़क पर चलने वाला व्यक्ति यह नहीं देखता कि सामने आने वाला वाहन किस दल के नेता का है या सरकार किसकी है। उसे सिर्फ सुरक्षित सड़क चाहिए।

सवाल विपक्ष से भी है। लगातार हादसों के बावजूद विपक्ष की ओर से भी इस मार्ग की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर वैसा जनदबाव दिखाई नहीं दे रहा, जिसकी क्षेत्रवासी अपेक्षा कर रहे हैं। ऐसे में लोगों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मौतें सड़क पर हो रही हैं तो राजनीति सड़क पर क्यों नहीं उतर रही?

अब जरूरत हादसे के बाद सिर्फ संवेदना जताने की नहीं, बल्कि दुर्घटना संभावित स्थानों का वैज्ञानिक परीक्षण कराने, रफ्तार पर नियंत्रण, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षित क्रॉसिंग और अन्य जरूरी सुरक्षा उपायों को लागू कराने की है। इसके लिए पुलिस, प्रशासन, एनएच और जनप्रतिनिधियों को मिलकर जवाबदेही तय करनी होगी।

किशन चौधरी की मौत के बाद हाईवे फिर लाल है। सवाल यह है कि अगली दुर्घटना के बाद फिर वही कार्रवाई होगी या इस बार जनप्रतिनिधि और सरकारी तंत्र मिलकर ऐसी व्यवस्था खड़ी करेंगे, जिससे अगली जान बचाई जा सके?

जनता अब जवाब चाहती है—हादसों का सिलसिला कब थमेगा और जिम्मेदारों की नींद कब टूटेगी?

उत्तराखंड