

उत्तराखंड में गुटखा-पान मसाले पर एक साल की रोक, अब सवाल—जमीन पर कितना होगा असर?
निर्माण से बिक्री तक प्रतिबंध के दायरे में तंबाकू-निकोटिन युक्त उत्पाद | खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी और कार्रवाई से तय होगी फैसले की असली परीक्षा!
प्रमोद बमेटा दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून।
जनस्वास्थ्य की सुरक्षा को लेकर उत्तराखंड सरकार ने गुटखा, पान मसाला और तंबाकू व निकोटिन युक्त उत्पादों के खिलाफ सख्त कदम उठाया है। राज्य में ऐसे प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष के लिए रोक लगा दी गई है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त विनय शंकर पांडेय ने मंगलवार को इस संबंध में आदेश जारी किया। आदेश जारी होने की तारीख से यह प्रतिबंध प्रभावी हो गया है।
सरकार के इस फैसले का दायरा केवल दुकानों पर होने वाली बिक्री तक सीमित नहीं है। प्रतिबंधित श्रेणी के उत्पादों को तैयार करने, गोदामों में रखने, एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और बाजार में बेचने की प्रक्रिया भी इसके दायरे में आएगी। आदेश का उद्देश्य खाद्य पदार्थों में तंबाकू और निकोटिन के इस्तेमाल पर रोक लगाने संबंधी प्रावधानों को प्रभावी बनाना और लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की ओर से जारी आदेश में खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 तथा खाद्य सुरक्षा और मानक (विक्रय प्रतिषेध और निर्बंधन) विनियम, 2011 के प्रावधानों का हवाला दिया गया है। संबंधित नियमों के तहत खाद्य पदार्थों में सामग्री के रूप में तंबाकू और निकोटिन का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। आदेश के मुताबिक, तंबाकू और निकोटिन युक्त गुटखा, पान मसाला अथवा किसी अन्य नाम से बाजार में उपलब्ध संबंधित खाद्य उत्पादों पर पाबंदी लागू होगी।
प्रतिबंध की घोषणा के बाद सबसे बड़ी चुनौती इसे बाजार में प्रभावी ढंग से लागू कराने की होगी। खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को दुकानों, बाजारों तथा गोदामों में निगरानी रखनी होगी, ताकि प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री और आपूर्ति पर अंकुश लगाया जा सके। केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके अनुपालन की नियमित जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई भी महत्वपूर्ण होगी।
उत्तराखंड में इस तरह की पाबंदियां पहले भी लगाई जा चुकी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2013, 2015 और 2019 में भी राज्य में ऐसे प्रतिबंध लागू किए गए थे। इसके बावजूद तंबाकू युक्त उत्पादों की उपलब्धता और इस्तेमाल पर पूरी तरह अंकुश लगाने की चुनौती बनी रही। ऐसे में इस बार की एक वर्षीय पाबंदी की सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि विभागीय निगरानी कितनी प्रभावी रहती है और प्रतिबंधित उत्पादों की आपूर्ति पर कितना नियंत्रण हो पाता है।
गुटखा और तंबाकू युक्त उत्पादों का सेवन मुंह के कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है। ऐसे में इन उत्पादों की उपलब्धता सीमित करने की दिशा में सरकार का यह कदम जनस्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्रतिबंध के वास्तविक परिणाम तभी सामने आएंगे, जब सरकारी आदेश का पालन बाजार से लेकर आपूर्ति श्रृंखला तक सुनिश्चित किया जाएगा।
अब नजर खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई और प्रशासन की निगरानी पर रहेगी। एक साल की पाबंदी ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या प्रतिबंध कागजों से निकलकर बाजार की हकीकत बदल पाएगा?
