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51वें वर्ष में पहुंची हल्दूचौड़ की ऐतिहासिक रामलीला, आस्था के मंच पर सजी संस्कृति और संस्कारों की विरासत।

विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट ने किया शुभारंभ, पूर्व में दिए एक लाख रुपये से संपन्न मंच सौंदर्यीकरण कार्य का भी किया विधिवत लोकार्पण, अध्यक्ष कैलाश दुमका के नेतृत्व में परंपरा को आगे बढ़ाने का लिया गया संकल्प।

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हल्दूचौड़ (नैनीताल)। जय श्रीराम के जयघोष, धार्मिक आस्था और भक्तिमय वातावरण के बीच हल्दूचौड़ की ऐतिहासिक रामलीला ने अपने 51वें वर्ष में प्रवेश किया। पांच दशक से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। सोमवार को विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट ने रामलीला का विधिवत शुभारंभ किया। इस दौरान रामलीला मंच के सौंदर्यीकरण के लिए उनके द्वारा पूर्व में दिए गए एक लाख रुपये से संपन्न कार्य का लोकार्पण भी किया गया। आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि रामलीला केवल धार्मिक मंचन नहीं, बल्कि पीढ़ियों को अपनी जड़ों, संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने वाली जीवंत परंपरा है।

समय बदला, जीवनशैली बदली और सामाजिक परिवेश में भी व्यापक परिवर्तन आया, लेकिन हल्दूचौड़ की रामलीला ने अपनी पहचान बनाए रखी। इसकी खासियत केवल रामायण के प्रसंगों का मंचन नहीं, बल्कि उन आदर्शों को समाज तक पहुंचाना है, जिन पर भारतीय संस्कृति की नैतिक बुनियाद टिकी है। भगवान श्रीराम का मर्यादित जीवन, भरत का त्याग, लक्ष्मण की सेवा और अधर्म पर धर्म की विजय जैसे प्रसंग आज भी समाज को कर्तव्य, संयम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट ने रामलीला के शुभारंभ अवसर पर भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्श सत्य, मर्यादा, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देते हैं। रामलीला के माध्यम से नई पीढ़ी को इन मूल्यों से परिचित कराने का अवसर मिलता है। ऐसी परंपराओं को जीवंत रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

हल्दूचौड़ की रामलीला से विधायक का पुराना जुड़ाव भी रहा है, ऐसे में उनके हाथों रामलीला का शुभारंभ और मंच सौंदर्यीकरण कार्य का लोकार्पण आयोजन के लिए विशेष महत्व रखता है। मंच के सौंदर्यीकरण के लिए पूर्व में दिए गए एक लाख रुपये से संपन्न कार्य का लोकार्पण रामलीला की व्यवस्थाओं को बेहतर स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इस ऐतिहासिक आयोजन की यात्रा में वर्तमान विधायक मोहन बिष्ट के अलावा पूर्व विधायक नवीन दुमका के साथ ही पूर्व कैबिनेट मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। हरीश चंद्र दुर्गापाल  पूर्व में रामलीला कमेटी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े लोगों का इस आयोजन से जुड़ाव इसकी व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। हालांकि, रामलीला की असली ताकत उन कलाकारों, आयोजकों, सहयोगियों और दर्शकों में है, जिनकी सामूहिक सहभागिता से यह परंपरा पांच दशक से अधिक समय से आगे बढ़ती रही है।

रामलीला के 51वें वर्ष में कमेटी के अध्यक्ष कैलाश दुमका के नेतृत्व में आयोजन को आगे बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। किसी ऐतिहासिक परंपरा को जीवित रखना केवल सालाना आयोजन तक सीमित नहीं होता। इसके लिए व्यवस्थाओं को संभालना, कलाकारों और सहयोगियों को साथ लेकर चलना तथा क्षेत्रवासियों की भागीदारी बनाए रखना जरूरी है। अध्यक्ष और कमेटी के सामने इस विरासत को नए दौर की पीढ़ी से जोड़ने की जिम्मेदारी भी है, ताकि रामलीला का महत्व केवल स्मृतियों तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक जीवन में भी बना रहे।

इस वर्ष की रामलीला के शुभारंभ अवसर पर  विशिष्ट अतिथि समाजसेवी देवेश कबड़वाल और कन्नू बमेटा ने  भी रामलीला के महत्व पर विचार रखे। उन्होंने ऐसे आयोजनों को सामाजिक एकता, आपसी सद्भाव और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने वाला माध्यम बताया। धार्मिक आयोजन तब और अधिक सार्थक बनते हैं, जब वे समाज को जोड़ने, परस्पर सहयोग बढ़ाने और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से परिचित कराने का काम करते हैं।

कार्यक्रम में रामलीला कमेटी के अध्यक्ष कैलाश दुमका, संरक्षक इंदर सिंह बिष्ट, उमेश शर्मा, उमेश कबड़वाल, दया किशन कबड़वाल, हरीश बिरखानी, बालदत्त दुमका, चंद्र बल्लभ खोलिया, कमलेश बमेटा, आचार्य उमेश गुणवंत, हरीश बिष्ट, निर्मला जग्गी, भुवन पंवार, देवेंद्र तिवारी, कपिल राणा, राधा, कैलाश भट्ट, बाला दत्त दुमका और अमन सुयाल समेत तमाम क्षेत्रवासी मौजूद रहे।

हल्दूचौड़ की ऐतिहासिक रामलीला का 51वें वर्ष में पहुंचना केवल आयोजन की निरंतरता का पड़ाव नहीं, बल्कि उस सामूहिक आस्था का प्रतीक है, जिसने बदलते समय के बीच भी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा है। रामलीला के मंच पर जब भगवान श्रीराम के आदर्श जीवंत होते हैं, तो समाज के सामने यह सवाल भी खड़ा होता है कि उन आदर्शों को अपने आचरण में कितना उतारा जा रहा है। यही इस आध्यात्मिक धरोहर की वास्तविक सार्थकता है। इसे सहेजना केवल आयोजकों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

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