








सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवहेलना!
पुरानी पेंशन पर सरकार का पलटवार, 6 हजार कर्मचारियों के साथ ‘भेदभाव’ का आरोप।
दर्पण न्यूज 24/7
देहरादून। उत्तराखण्ड में पुरानी पेंशन को लेकर सरकार एक बार फिर कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। सिंचाई विभाग और लोक निर्माण विभाग के कार्यप्रभारित अधिष्ठान से नियमित हुए सेवानिवृत्त व कार्यरत कर्मचारियों ने राज्य सरकार पर मा० सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करने का गंभीर आरोप लगाया है। संयुक्त संघर्ष समिति ने इसे “संवैधानिक आदेशों को रौंदने” जैसा बताते हुए सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
संघर्ष समिति का आरोप है कि मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रेम सिंह बनाम राज्य सरकार मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार कार्यप्रभारित अधिष्ठान की पूरी सेवा जोड़ते हुए सभी नियमित कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लाभ दिया जाना अनिवार्य है। इसी फैसले के आधार पर वर्ष 2020 में सिंचाई एवं लोक निर्माण विभाग ने शासनादेश जारी किए और 80 प्रतिशत कर्मचारियों को पेंशनरी लाभ भी दे दिए गए।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जब 80 प्रतिशत कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लाभ मिल चुका है, तो शेष 20 प्रतिशत कर्मचारियों से वही अधिकार क्यों छीने जा रहे हैं?
कर्मचारियों का आरोप है कि 08 मई 2023 को सरकार द्वारा लाए गए अधिनियम के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया गया और लगभग 20 प्रतिशत कर्मचारियों को पेंशन से वंचित कर दिया गया। इसे संघर्ष समिति ने “न्याय नहीं, नीतिगत छल” करार दिया है।
आरोप यह भी है कि सरकार ने पहले आश्वासन देकर कर्मचारियों को भ्रमित किया। 24 दिसंबर 2025 को कैबिनेट में 20 प्रतिशत शेष कर्मचारियों को भी पुरानी पेंशन देने का प्रस्ताव लाया गया। प्रमुख सचिव स्तर से प्रेस वार्ता कर करीब 6000 कर्मचारियों को पेंशन लाभ दिए जाने की बात कही गई और यह समाचार मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुआ।
लेकिन ठीक इसके उलट 16 जनवरी 2026 को जारी शासनादेश ने एक बार फिर पुरानी पेंशन पर ताला जड़ दिया। कर्मचारियों का कहना है कि यह आदेश न केवल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अपमान है, बल्कि सरकार की कथनी और करनी के बीच गहरे अंतर को भी उजागर करता है।
संघर्ष समिति ने तीखा सवाल उठाया है कि क्या सरकार न्यायालय से ऊपर है?
और यदि नहीं, तो फिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनिंदा कर्मचारियों पर लागू कर बाकी को वंचित क्यों किया जा रहा है?
कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि जिन कर्मचारियों को पहले से पेंशन मिल रही है, उन्हें भी रोकने की तैयारी की जा रही है, जो न केवल अमानवीय है बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा के भी खिलाफ है।
संघर्ष समिति ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस “काले शासनादेश” को तत्काल वापस लेकर सभी कार्यप्रभारित से नियमित कर्मचारियों को समान रूप से पुरानी पेंशन का लाभ नहीं दिया गया, तो प्रदेशभर में आंदोलन और तेज किया जाएगा। किसी भी अप्रिय स्थिति की पूरी जिम्मेदारी सरकार, शासन और संबंधित विभागों की होगी।
ज्ञापन की प्रतिलिपि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, विधायक प्रीतम सिंह सहित मीडिया संस्थानों को भेज दी गई है, जिससे यह मुद्दा अब सड़कों से लेकर सियासी गलियारों तक गूंजने लगा है।
