








पहाड़ के वोटों से शिखर तक पहुंचे, अब मैदान पर नजर क्यों?
पहाड़ से पलायन रोकने की राजनीति के बीच राजनीतिक पलायन पर सवाल, जिस कर्मभूमि ने पहचान दी, उसी से दूरी क्यों?
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ और पलायन हमेशा बड़े मुद्दे रहे हैं। खाली होते गांव, रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जाते युवा और बंजर होते खेतों की तस्वीर राजनीतिक मंचों पर चिंता का विषय बनती रही है। सरकारें और राजनीतिक दल पहाड़ से पलायन रोकने के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने की बात करते हैं।
इसी बहस के बीच अब एक दूसरा सवाल भी राजनीतिक विमर्श में जगह बना रहा है—क्या पलायन केवल गांवों से हो रहा है या उत्तराखंड की राजनीति भी धीरे-धीरे पहाड़ से मैदान की ओर खिसक रही है?
सवाल उन राजनीतिक चेहरों को लेकर है, जिन्होंने अपनी पहचान और राजनीतिक आधार पहाड़ की जमीन से बनाया, लेकिन बाद के दौर में राजनीतिक संभावनाओं के लिए मैदान को अधिक मुफीद माना। सवाल किसी व्यक्ति विशेष के चुनाव लड़ने के अधिकार पर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच पर है, जिसमें जिस कर्मभूमि ने नेतृत्व को पहचान दी, उसी कर्मभूमि में अगली पीढ़ी के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कम दिखाई देती है।
जिस पहाड़ ने पहचान दी, उसके प्रति जिम्मेदारी भी है?
बागेश्वर मूल के वरिष्ठ पत्रकार भगवान सिंह गंगोला और वरिष्ठ पत्रकार दलीप सिंह गड़िया ने इसी सवाल को सामने रखा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी नेता को किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अधिकार है। लेकिन जनता को यह पूछने का भी अधिकार है कि जिस क्षेत्र ने किसी नेता को राजनीतिक पहचान दी, उसके प्रति उसकी जिम्मेदारी क्या है?
यह सवाल खास तौर पर तब महत्वपूर्ण हो जाता है, जब चर्चा राजनीतिक विरासत की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने की हो।
जिस पहाड़ की जमीन ने राजनीतिक सफर की शुरुआत कराई, क्या उसी जमीन पर अगली पीढ़ी को भी जनता के बीच संघर्ष करने और अपना जनाधार बनाने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?
आम युवा का पलायन मजबूरी, राजनीति का पलायन रणनीति?
उत्तराखंड में पलायन की वजहों पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में पहाड़ से मैदान आने वाले युवाओं की संख्या लगातार राजनीतिक चिंता का विषय रही है।
लेकिन इसी संदर्भ में एक असहज सवाल सामने आता है।
जब आम पहाड़ी बेहतर भविष्य के लिए मैदान की ओर जाता है तो उसे पलायन कहा जाता है, तो क्या राजनीतिक भविष्य के लिए पहाड़ से मैदान की ओर बढ़ना भी इसी बहस का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
बेशक दोनों परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। किसी व्यक्ति को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए क्षेत्र चुनने का पूरा अधिकार है। मगर राजनीतिक दलों के लिए यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि क्या पहाड़ में स्थानीय नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार हो रही है या वहां की राजनीतिक जमीन पर बाहरी और प्रभावशाली चेहरों की निर्भरता बढ़ रही है?
स्थानीय कार्यकर्ता की सबसे बड़ी कसक
राजनीतिक दलों का आधार स्थानीय कार्यकर्ता होता है। यही कार्यकर्ता वर्षों तक बूथ और गांव स्तर पर संगठन खड़ा करता है। चुनाव के समय पार्टी के पक्ष में माहौल बनाता है और जनता के बीच लगातार सक्रिय रहता है।
ऐसे में जब चुनाव का समय आता है और किसी दूसरे क्षेत्र से प्रभावशाली चेहरा दावेदारी में सामने आता है तो स्थानीय कार्यकर्ताओं के मन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
उनका सवाल सीधा होता है—
“जब वर्षों से जमीन हम तैयार कर रहे हैं, तो राजनीतिक अवसर के समय किसी दूसरे चेहरे को प्राथमिकता क्यों?”
यही सवाल पैराशूट प्रत्याशी की बहस को जन्म देता है।
राजनीतिक विरासत के साथ अपनी जमीन भी जरूरी
राजनीतिक परिवारों से नई पीढ़ी का राजनीति में आना कोई असामान्य बात नहीं है। जनता यदि किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य को स्वीकार करती है तो उसे चुनाव लड़ने का पूरा अधिकार है।
लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में विरासत के साथ अपनी स्वीकार्यता और अपना जनाधार भी जरूरी है।
राजनीतिक विरासत किसी के लिए रास्ता आसान कर सकती है, लेकिन लंबे समय तक राजनीति में टिके रहने के लिए जनता के बीच काम करना ही पड़ता है।
इसीलिए बहस का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि कौन किसका बेटा, भतीजा या रिश्तेदार है। असली सवाल यह है कि किसने किस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और वहां जनता के बीच कितनी राजनीतिक मेहनत की?
पहाड़ को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, राजनीतिक केंद्र भी बनाना होगा
उत्तराखंड का पहाड़ राज्य की राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार रहा है। राज्य आंदोलन से लेकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने वाले अनेक नेताओं की राजनीतिक यात्रा पहाड़ की जमीन से शुरू हुई।
ऐसे में पहाड़ को केवल भावनात्मक मुद्दे या चुनावी जरूरत तक सीमित रखना उसकी राजनीतिक ताकत को कमजोर कर सकता है।
यदि पहाड़ से पलायन रोकना है तो स्थानीय युवाओं को रोजगार और सुविधाओं के साथ राजनीतिक अवसर भी देने होंगे। स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया मजबूत करनी होगी और गांव-गांव काम करने वाले कार्यकर्ताओं को यह भरोसा देना होगा कि उनकी मेहनत का राजनीतिक मूल्य भी है।
सवाल नेताओं से भी, राजनीतिक दलों से भी
उत्तराखंड की राजनीति के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि पहाड़ से पलायन कैसे रोका जाए।
सवाल यह भी है कि क्या पहाड़ राजनीतिक रूप से अपने नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार कर पा रहा है?
क्या राजनीतिक दल पहाड़ के स्थानीय कार्यकर्ताओं और युवाओं को पर्याप्त अवसर दे रहे हैं?
क्या राजनीतिक विरासत का अगला पड़ाव उसी कर्मभूमि में होना चाहिए, जिसने पिछली पीढ़ी को पहचान दी?
और सबसे बड़ा सवाल—
“जिस पहाड़ के वोटों ने राजनीतिक शिखर तक पहुंचाया, उसी पहाड़ को छोड़कर मैदान में नई सियासी जमीन तलाशने की जरूरत क्यों पड़ रही है?”
यह सवाल किसी एक पार्टी या नेता का नहीं है। यह उत्तराखंड की राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा सवाल है।
क्योंकि यदि पहाड़ को बचाने की चिंता वास्तविक है तो पहाड़ को केवल वोट की जमीन नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की जमीन भी बनाना होगा।
पहाड़ ने बहुत कुछ दिया है। अब सवाल यह है कि उसकी राजनीति और उसकी अगली पीढ़ी को कितना लौटाया जाएगा।
