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ग्रामीण भारत को भूल गया 2047 का ‘विकसित भारत’ बजट: हरदा का तीखा प्रहार!

महंगी शिक्षा-इलाज से त्रस्त मध्यम वर्ग, किसानों-छोटे उद्योगों को भी नहीं मिली राहत!

✍️ प्रमोद बमेटा | ब्यूरो चीफ, उत्तराखंड | दर्पण न्यूज 24/7

देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत (हरदा) ने केंद्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आम बजट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बजट 2047 के विकसित भारत का खाका खींचते-खींचते ग्रामीण भारत, कृषि और लघु उद्योगों को भूल गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बजट आम आदमी की सबसे बड़ी चिंताओं—महंगी शिक्षा और इलाज—पर कोई ठोस राहत नहीं देता।

हरीश रावत ने सोशल मीडिया के माध्यम से बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह लगातार नौवां बजट ग्रामीण रोजगार सृजन की दिशा में कमजोर साबित होता है। उन्होंने कहा कि कृषि, ग्रामीण विकास और लघु उद्योगों के लिए आवंटन की वृद्धि रक्षा, परिवहन व अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहद कम है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर घटेंगे और छोटे उद्योगों को मजबूती देने का अवसर इस बजट में नहीं दिखता।

हरदा ने कहा कि एआई और आधुनिक तकनीकों से नई संभावनाएं जरूर बनेंगी, लेकिन इससे सामान्य और परंपरागत रोजगारों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिससे बेरोजगारी बढ़ने की आशंका है। पर्यटन के क्षेत्र में बौद्धिक और क्षैतिज विकास की बात तो की गई है, साथ ही हिमालयी राज्यों में ट्रैकिंग हब विकसित करने की घोषणा भी हुई है, लेकिन ईको-टूरिज्म के व्यापक आयामों और उसके लिए आवश्यक पूंजीगत निवेश पर बजट खामोश है। इससे उत्तराखंड और हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों को कोई ठोस विशेष लाभ मिलता नहीं दिखता।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे वन बहुल और हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस की उम्मीद थी। मध्य हिमालयी क्षेत्रों के किसानों, बागवानी करने वाले ग्रामीणों और जंगलों के संरक्षण से जुड़े समुदायों को कार्बन क्रेडिट स्कीम से जोड़ने की अपेक्षा थी, लेकिन बजट में इस दिशा में कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया।

हरीश रावत ने मध्यम वर्ग की पीड़ा को रेखांकित करते हुए कहा कि आज शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं। निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग के लिए बच्चों की प्रतिस्पर्धी शिक्षा और परिवार के इलाज का खर्च उठाना बेहद कठिन हो गया है, लेकिन बजट इन बोझों को कम करने में कहीं भी सहायक नहीं दिखता।

उन्होंने असंगठित क्षेत्र और गिग वर्कर्स का जिक्र करते हुए कहा कि लंबे समय से इनके लिए सामाजिक सुरक्षा और आय बढ़ाने वाली योजनाओं की चर्चा हो रही थी, लेकिन बजट में इनके लिए किसी ठोस योजना का जिक्र नहीं है। इससे असंगठित मजदूर मजबूरी में जीवन यापन करते रहने को मजबूर होंगे।

आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन पर भी उन्होंने चिंता जताई। हरदा ने कहा कि क्लाइमेट चेंज के बढ़ते दुष्प्रभावों से निपटने के लिए विशेष रूप से मध्य हिमालयी राज्यों को मजबूत बनाने की जरूरत थी। योजनाओं और आर्थिक सहायता के जरिए राज्यों को सक्षम करने की अपेक्षा थी, लेकिन इस मुद्दे पर भी बजट खामोश नजर आता है।

अंत में हरीश रावत ने कहा कि एक मध्य हिमालयी राज्य के नागरिक, उत्तराखंड के निवासी और देश के सामान्य जन के रूप में यह बजट उन्हें निराश करता है।

उन्होंने कहा कि यह बजट न तो ग्रामीण भारत की पीड़ा समझ पाया और न ही मध्यम वर्ग, किसानों और छोटे उद्यमियों की वास्तविक जरूरतों को संबोधित कर सका।

 

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