किशनपुर सकुलिया गांव का प्रवेश द्वार बना तालाब, आखिर जिम्मेदार कौन?
चंद लोगों के कथित निहित स्वार्थ की कीमत चुका रहा पूरा गांव, बच्चों की पढ़ाई से मरीजों के इलाज तक पर संकट, महीनों से जलभराव, निरीक्षण के बाद भी कार्रवाई का इंतजार!
दर्पण न्यूज 24/7 हल्द्वानी। मोटाहल्दू के किशनपुर सकुलिया गांव के मुख्य प्रवेश मार्ग पर महीनों से जमा पानी ने सड़क को तालाब में बदल दिया है। सवाल यह है कि आखिर इस बदहाली का जिम्मेदार कौन है? क्या कुछ लोगों के कथित निहित स्वार्थ के आगे पूरे गांव की सुविधा और सुरक्षा बौनी हो गई है? क्या किसी भूमि विवाद के कारण हजारों ग्रामीणों को नरकीय हालात में जीने के लिए मजबूर किया जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि जब प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण कर लिया है, तो फिर स्थायी समाधान के लिए ठोस कार्रवाई कब होगी?
किशनपुर सकुलिया के मुख्य प्रवेश मार्ग की तस्वीर इन दिनों विकास के दावों को आईना दिखा रही है। सड़क पर महीनों से जमा पानी और गहरे गड्ढों ने ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बरसात में हालात और भी गंभीर हो जाते हैं। सड़क और तालाब के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आने-जाने वाला हर व्यक्ति इस समस्या से प्रभावित है, लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों, मरीजों, बुजुर्गों और वाहन चालकों को उठानी पड़ रही है।
जिम्मेदार कौन? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि ग्रामीणों के अनुसार यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है। लंबे समय से पानी की निकासी बाधित होने के कारण सड़क पर जलभराव हो रहा है। यदि वर्षों पुराना प्राकृतिक जलनिकासी मार्ग बाधित हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई? यदि कहीं अतिक्रमण हुआ है तो प्रशासन ने अब तक इसकी जांच क्यों नहीं कराई? और यदि मामला भूमि विवाद का है तो विवाद का समाधान करने के बजाय पूरे गांव को उसके हाल पर क्यों छोड़ दिया गया?
ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ लोगों ने कथित रूप से अतिक्रमण कर दुकानें और अन्य निर्माण कर लिए हैं, जिससे पानी की प्राकृतिक निकासी बाधित हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि इसी वजह से पानी सड़क पर जमा होकर तालाब का रूप ले रहा है। हालांकि इस आरोप की प्रशासनिक पुष्टि होना बाकी है, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत गंभीर है और इसकी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी सार्वजनिक रास्ते या जलनिकासी मार्ग पर अतिक्रमण है तो प्रशासन को राजस्व अभिलेखों और मौके की स्थिति का सत्यापन कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। यदि निजी भूमि को लेकर विवाद है तो प्रशासन को दोनों पक्षों को बुलाकर समाधान निकालना चाहिए। लेकिन किसी भी स्थिति में पूरे गांव को समस्या के बीच छोड़ देना उचित नहीं है।
जिम्मेदार कौन? उस व्यवस्था का कौन जिम्मेदार है, जो एक तरफ सड़क निर्माण और विकास के दावे करती है, लेकिन दूसरी तरफ गांव के मुख्य प्रवेश मार्ग को महीनों तक जलभराव से मुक्त नहीं करा पाती? आखिर किस विभाग की जिम्मेदारी है कि सड़क पर पानी जमा न हो? लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग या स्थानीय प्रशासन—या फिर सभी विभागों की सामूहिक जिम्मेदारी है?
ग्रामीणों का कहना है कि इस जलभराव के कारण स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। बच्चे पानी और कीचड़ से होकर स्कूल जाने को मजबूर हैं। कई बार वे समय पर विद्यालय नहीं पहुंच पाते। वहीं किसी मरीज को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ने पर परिजनों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि किसी आपात स्थिति में मरीज को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
सड़क पर बने गहरे गड्ढे भी दुर्घटनाओं को न्योता दे रहे हैं। पानी भरने के कारण गड्ढों की गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता। ग्रामीणों के अनुसार कई छोटी गाड़ियां इनमें फंस चुकी हैं और वाहन क्षतिग्रस्त हुए हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है या उससे पहले ही प्रशासन जागेगा?
ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान पुष्पा जोशी, पूर्व प्रधान बिपिन जोशी और क्षेत्र पंचायत सदस्य हरीश कब्डाल के नेतृत्व में इस समस्या को क्षेत्रीय विधायक डॉ. मोहन बिष्ट के समक्ष रखा था। विधायक की ओर से कार्रवाई का आश्वासन भी दिया गया। इसके बाद 22 जुलाई को क्षेत्रीय पटवारी आरिफ हुसैन, सिंचाई विभाग के अवर अभियंता अविनाश दानू तथा लोक निर्माण विभाग के अवर अभियंता ने मौके का स्थलीय निरीक्षण किया।
अधिकारियों के निरीक्षण के बाद ग्रामीणों को उम्मीद जगी कि अब समस्या का समाधान निकलेगा। लेकिन सवाल अभी भी वहीं खड़ा है, निरीक्षण के बाद अगला कदम क्या है? क्या कोई संयुक्त कार्ययोजना बनेगी? क्या जलनिकासी का स्थायी रास्ता तैयार होगा? क्या कथित अतिक्रमण की जांच होगी? क्या भूमि विवाद का निस्तारण किया जाएगा? या फिर यह मामला भी निरीक्षण और आश्वासन की फाइलों में दबकर रह जाएगा?
ग्रामीणों का कहना है कि दो पक्षों के विवाद का खामियाजा पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है। उनका स्पष्ट कहना है कि प्रशासन को किसी व्यक्ति विशेष के हित के बजाय जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि कहीं अतिक्रमण है तो निष्पक्ष जांच के बाद कार्रवाई हो और यदि विवाद है तो उसका तत्काल समाधान निकाला जाए। किसी भी स्थिति में गांव के हजारों लोगों को बुनियादी आवागमन की सुविधा से वंचित रखना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अब ग्रामीणों ने प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया है कि आश्वासन का दौर बहुत हो चुका, अब कार्रवाई चाहिए। यदि जल्द स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो ग्रामीण जिलाधिकारी और कुमाऊं आयुक्त से मुलाकात करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन का रास्ता भी अपनाएंगे।
किशनपुर सकुलिया के ग्रामीणों की मांग सीधी है कि सड़क को तालाब बनने से रोका जाए, जलनिकासी का स्थायी समाधान किया जाए और यदि किसी अतिक्रमण अथवा अवरोध के कारण यह स्थिति पैदा हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।क्योंकि सवाल सिर्फ एक सड़क का नहीं है। सवाल बच्चों की पढ़ाई का है। सवाल मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने का है। सवाल ग्रामीणों की सुरक्षा का है। सवाल सार्वजनिक रास्ते के अधिकार का है। और सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है—किशनपुर सकुलिया की इस दुर्दशा का जिम्मेदार आखिर कौन है?
ग्रामीणों का कहना है कि अब प्रशासन को इस सवाल का जवाब सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि धरातल पर कार्रवाई करके देना होगा।
निरीक्षण के दौरान चंदन सुयाल, हीरा जोशी, अमरदीप पांडे, स्नेह भंडारी, हरीश पांडे, आनंद कपिल सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
