16 साल बाद भी अधूरी झिमार-गुलार-भीताकोट सड़क, 692 लाख खर्च के बाद भी बस चलने लायक नहीं
24 गांवों की 10 हजार से अधिक आबादी को सुविधा के बजाय मिल रही परेशानी, सुरक्षा दीवारें टूटीं, नालियां बंद और कई जगह वाइडनिंग अधूरी
करोड़ों की योजना पर सवाल : आखिर सरकारी धन खर्च होने के बाद भी सड़क मानकों पर क्यों नहीं उतर सकी खरी?
(यू एन कोठारी) मौलेखाल। सरकार पहाड़ के गांवों को सड़क से जोड़ने और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लाख दावे करती है, लेकिन अल्मोड़ा और पौड़ी गढ़वाल की सीमा को जोड़ने वाली झिमार-गुलार-भीताकोट सड़क सरकारी दावों और धरातल की हकीकत के बीच का फासला साफ दिखा रही है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत वर्ष 2009 में शुरू हुई करीब 17 किलोमीटर लंबी यह सड़क 16 साल बाद भी पूरी तरह मानकों के अनुरूप तैयार नहीं हो सकी है। करीब 692.27 लाख रुपये की लागत वाली इस योजना से जुड़े 24 से अधिक गांवों और 10 हजार से ज्यादा ग्रामीणों को आज भी उस सुविधा का इंतजार है, जिसके लिए यह सड़क बनाई गई थी। हालत यह है कि सड़क पर शुरू की गई बस सेवा भी कुछ समय बाद बंद करनी पड़ी।
सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि किसी मार्ग पर नियमित बस संचालन तक संभव न हो तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर निर्माण के दौरान गुणवत्ता और तकनीकी मानकों की निगरानी किस स्तर पर हुई। क्या सड़क की गुणवत्ता की जांच केवल कागजों में होती रही या जिम्मेदार अधिकारियों ने धरातल पर भी इसकी वास्तविक स्थिति देखी? यदि सड़क निर्माण में खामियां थीं तो उन्हें समय रहते दूर क्यों नहीं किया गया? और यदि सड़क मानकों के अनुरूप थी तो आज परिवहन विभाग के निरीक्षण में बस संचालन के लिए असुरक्षित स्थिति क्यों सामने आ रही है?
झिमार-गुलार-भीताकोट मोटर मार्ग पहले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत स्वीकृत हुआ था। प्रारंभिक कटिंग का कार्य पूरा होने के बाद निर्माण कार्य एनपीसीसी को हस्तांतरित किया गया और स्टेज-2 निर्माण की जिम्मेदारी नैनी वैली कंस्ट्रक्शन को दी गई। सड़क का उद्देश्य पांच ग्राम सभाओं के करीब 24 गांवों को बेहतर यातायात सुविधा से जोड़ना था। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सड़क बनने से उन्हें अस्पताल, बाजार, शिक्षा और रोजगार के लिए आवागमन में राहत मिलेगी, लेकिन 16 साल बाद भी यह उम्मीद पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सकी है।
क्षेत्र के समाजसेवी, भीताकोट ग्राम सभा के पूर्व प्रधान एवं क्षेत्र पंचायत सदस्य डॉ. महेश कोठारी लंबे समय से इस सड़क के निर्माण की गुणवत्ता और अधूरे कार्यों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधिकारियों को सड़क की खामियों और मानकों की अनदेखी के संबंध में कई बार लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया। सड़क को पूरा कराने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री और प्रधानमंत्री तक से अपील की गई, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान आज तक नहीं हो पाया।
क्षेत्रीय विधायक महेश जीना ने भी सड़क के लंबित कार्यों को पूरा कराने के लिए अधिकारियों से कई बार वार्ता की और सख्त निर्देश दिए। इसके बाद कुछ निर्माण कार्य कराया गया, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यह कार्य भी समस्या का स्थायी समाधान करने के बजाय महज खानापूर्ति साबित हुआ। छोटे वाहन, जीप, कार और बाइक तो किसी तरह चल रहे हैं, लेकिन सड़क अभी भी बस और भारी वाहनों के संचालन के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
परिवहन विभाग के संयुक्त निरीक्षण में सड़क की कई खामियां सामने आने की बात कही जा रही है। कई स्थानों पर तीन से चार मीटर तक वाइडनिंग का कार्य शेष है। सड़क की चौड़ाई, सुरक्षा और जल निकासी से जुड़ी समस्याएं भी सामने आई हैं। ग्रामीणों के अनुसार कई स्थानों पर सुरक्षा दीवारें क्षतिग्रस्त हैं, नालियां बंद पड़ी हैं और सड़क पर मलबा जमा है। बारिश के दौरान जल निकासी की व्यवस्था नहीं होने से सड़क की स्थिति और खराब हो जाती है।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पहाड़ी सड़कों पर सुरक्षा दीवारें और जल निकासी व्यवस्था केवल सुविधा का हिस्सा नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा से सीधे जुड़ी होती हैं। ऐसे में करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क पर यदि ये व्यवस्थाएं ही दुरुस्त नहीं हैं तो निर्माण की गुणवत्ता और विभागीय निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ग्रामीणों को राहत देने के लिए पिछले वर्ष आदर्श मोटर कंपनी ने इस मार्ग पर बस सेवा शुरू की थी। बस चलने से क्षेत्र के लोगों को लगा कि वर्षों की परेशानी अब दूर होगी। लेकिन कुछ समय बाद सड़क की तकनीकी और सुरक्षा संबंधी समस्याओं के कारण बस सेवा बंद करनी पड़ी। आदर्श मोटर कंपनी के सचिव सुंदर सिंह के अनुसार सड़क की खराब स्थिति के कारण बस संचालन में आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा था।
यानी जिस सड़क को ग्रामीणों की सुविधा के लिए बनाया गया, वही सड़क सार्वजनिक परिवहन के संचालन में बाधा बन गई। यह स्थिति सरकारी योजनाओं की जमीनी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि बस संचालन के लिए सड़क सुरक्षित नहीं है तो फिर सड़क निर्माण पूरा होने के दावे किस आधार पर किए गए?
क्षेत्रीय विधायक की पहल पर हाल ही में करीब 20 लाख रुपये की लागत से कॉजवे की मरम्मत भी कराई गई, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इसके बावजूद सड़क की मूल समस्याएं जस की तस हैं। कई हिस्सों में चौड़ाई, सुरक्षा और जल निकासी की समस्या बनी हुई है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद लाखों रुपये की मरम्मत और फिर भी समस्या का समाधान नहीं होना यह सवाल खड़ा करता है कि सरकारी धन का उपयोग किस तरह और किस निगरानी में किया जा रहा है।
एआरटीओ रामनगर पंकज श्रीवास्तव के अनुसार संयुक्त निरीक्षण की रिपोर्ट संभागीय परिवहन प्राधिकरण को भेजी जाएगी और रिपोर्ट के आधार पर बस संचालन पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि बस संचालन का निर्णय बाद की बात है। पहले सड़क को पूरी तरह निर्धारित तकनीकी और सुरक्षा मानकों के अनुरूप तैयार किया जाना चाहिए, ताकि क्षेत्र के लोगों को स्थायी और सुरक्षित यातायात सुविधा मिल सके।
झिमार-गुलार-भीताकोट सड़क आज सरकार के विकास के दावों को आईना दिखा रही है। एक तरफ सरकार पहाड़ में सड़क, विकास और पलायन रोकने की बात करती है, दूसरी तरफ 16 साल पहले शुरू हुई सड़क परियोजना आज भी अधूरी व्यवस्थाओं से जूझ रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि 24 गांवों की जनता को सुरक्षित सड़क और नियमित बस सेवा नहीं मिल पा रही है तो यह केवल विभागीय लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न है।
अब सरकार को यह बताना होगा कि 692.27 लाख रुपये की लागत वाली सड़क 16 साल बाद भी मानकों पर खरी क्यों नहीं उतर सकी? निर्माण के दौरान जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या निगरानी की? सुरक्षा दीवारें और नालियां समय रहते क्यों नहीं सुधारी गईं? वाइडनिंग का काम आज तक क्यों अधूरा है? और सबसे बड़ा सवाल—जिस सड़क पर बस तक नहीं चल पा रही, उस पर खर्च हुए करोड़ों रुपये की जवाबदेही आखिर किसकी है?
ग्रामीणों की मांग है कि सड़क की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराकर निर्माण की गुणवत्ता और खर्च की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। शेष वाइडनिंग कार्य तत्काल पूरा कराया जाए, क्षतिग्रस्त सुरक्षा दीवारों की मरम्मत, नालियों और जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त की जाए तथा सड़क को निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार कर नियमित बस संचालन का रास्ता साफ किया जाए।
16 साल का इंतजार अब सवाल बन चुका है। 692 लाख से अधिक का खर्च अब जवाब मांग रहा है और 24 गांवों की जनता सरकार की ओर देख रही है। देखना यह है कि जिम्मेदार इस आईने में अपना चेहरा देखते हैं या फिर यह सड़क भी सरकारी फाइलों में विकास की एक और अधूरी कहानी बनकर रह जाती है।
