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खड़गे के मंच का ‘शुद्धिकरण’ को  भाजपा की दलित-विरोधी मानसिकता करार देते हुए संसद में गूंजी आवाज!

‘मंच नहीं, मानसिकता का शुद्धिकरण जरूरी’,कांग्रेस का हमला, खड़गे ने अस्पृश्यता कानून में कार्रवाई की उठाई मांग, नड्डा बोले दोषी मिले तो होगी सख्त कार्रवाई!

दर्पण न्यूज 24/7 हल्द्वानी/नई दिल्ली।

हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद कथित मंच शुद्धिकरण का मामला अब उत्तराखंड की सियासत से निकलकर संसद के केंद्र में पहुंच गया है। कांग्रेस ने इस घटना को भाजपा की कथित दलित-विरोधी मानसिकता और सामाजिक बराबरी के खिलाफ सोच का प्रतीक करार देते हुए भाजपा पर सीधा हमला बोला है। हालांकि भाजपा की ओर से ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करने की बात कही गई है और सरकार ने जांच के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता खड़गे ने कहा कि उन्होंने हल्द्वानी की सभा में किसी धर्म या समाज के किसी वर्ग के खिलाफ कुछ नहीं कहा, बल्कि जनता की समस्याएं उठाईं। इसके बावजूद उनके संबोधन के बाद मंच का कथित रूप से शुद्धिकरण किया गया। खड़गे ने इसे अपने अपमान के साथ-साथ संविधान की मूल भावना पर चोट बताते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ अस्पृश्यता कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग की।

दलित नेता के भाषण के बाद ‘शुद्धिकरण’ पर सबसे बड़ा सवाल

कांग्रेस का सबसे तीखा सवाल यही है कि यदि रामलीला मैदान सभी राजनीतिक दलों और आम जनता के लिए सार्वजनिक स्थान है, तो किसी नेता के भाषण के बाद वहां हवन और गंगाजल छिड़कने की जरूरत क्यों पड़ी?

कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि आठ अगस्त की रैली में खड़गे के साथ प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य भी मौजूद थे और ये नेता दलित समाज से आते हैं। ऐसे में रैली के दो दिन बाद कथित शुद्धिकरण का आयोजन किए जाने को कांग्रेस ने महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जातिगत मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन बताया है।

हालांकि आयोजन करने वाले संगठन ने इसे रामलीला मैदान की धार्मिक पवित्रता से जोड़ते हुए अपना पक्ष रखा है।

खड़गे का सवाल? क्या लोकतंत्र में जाति के आधार पर तय होगी पवित्रता?

राज्यसभा में खड़गे ने तीखे सवालों के जरिए घटना पर सरकार को घेरा। उन्होंने पूछा कि क्या लोकतंत्र इसी तरह चलेगा? संविधान की रक्षा कैसे होगी?

उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन में दशकों से संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेता के भाषण के बाद मंच को शुद्ध करना बेहद गंभीर संदेश देता है।

कांग्रेस का कहना है कि संविधान ने सदियों पुरानी छुआछूत और ऊंच-नीच की व्यवस्था को समाप्त किया है। ऐसे में किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान के आधार पर सार्वजनिक मंच को ‘शुद्ध’ करने की कथित कोशिश सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि समानता के संवैधानिक अधिकार का अपमान है।

नड्डा का जवाब ! भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती।

मामले पर सदन के नेता एवं केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने घटना की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह दुखद है और भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती। उन्होंने पूरे मामले की जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया।

राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने भी घटना की निंदा करते हुए कहा कि अस्पृश्यता अपराध है और मामले की जांच होनी चाहिए।

यशपाल आर्य का वार ‘जाति की दीवारें खड़ी करने का समय नहीं’

उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी इस प्रकरण को लेकर भाजपा पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोकतांत्रिक चेतना से रही है। ऐसे में हल्द्वानी में इस तरह की घटना सामने आना प्रदेश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

आर्य ने कहा कि सार्वजनिक स्थान किसी व्यक्ति की जाति से पवित्र या अपवित्र नहीं होते। लोकतंत्र में सार्वजनिक मैदान जनता के हैं और वहां अलग-अलग राजनीतिक दलों की सभाएं होना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।

उन्होंने कहा कि समाज को जोड़ने का समय है, जाति और ऊंच-नीच की दीवारें खड़ी करने का नहीं।

हल्द्वानी से उठी चिंगारी, बनी राष्ट्रीय बहसआठ अगस्त की कांग्रेस विजय शंखनाद रैली के दौरान ही राजनीतिक माहौल गरम था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के वाहनों की चेकिंग को लेकर प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के नेतृत्व में कार्यकर्ता एसएसपी कार्यालय तक पहुंच गए थे।

इसके बाद 10 अगस्त को रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़कने की घटना ने विवाद को नया मोड़ दे दिया। अब खड़गे द्वारा संसद में मामला उठाए जाने के बाद यह प्रकरण सिर्फ भाजपा-कांग्रेस की स्थानीय राजनीतिक लड़ाई नहीं रहा, बल्कि सामाजिक बराबरी, अस्पृश्यता और संवैधानिक मूल्यों पर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया है।

सबसे बड़ा सवाल: आस्था या जातिगत भेदभाव?

अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि रामलीला मैदान में किया गया हवन और गंगाजल छिड़काव वास्तव में धार्मिक परंपरा के तहत था या कांग्रेस नेताओं की जातिगत पहचान को लेकर कोई भेदभावपूर्ण सोच इसके पीछे थी।

कांग्रेस ने इसे दलित अस्मिता और संविधान पर हमला बताया है, जबकि भाजपा ने ऐसी गतिविधियों से खुद को अलग करते हुए जांच और कार्रवाई की बात कही है।

अब निगाहें सरकार की जांच पर हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कार्रवाई कितनी कठोर होगी—यही तय करेगा कि हल्द्वानी के इस विवाद को महज राजनीतिक बयानबाजी माना जाएगा या सामाजिक बराबरी के सवाल पर एक निर्णायक कार्रवाई की शुरुआत।