जो नाला था कल तक रहमत-ए-आब,
आज वही बना खौफ और ज़हर का ख्वाब।
सेंचुरी पेपर मिल के वेस्ट वाटर से बदली घोड़ानाले की तस्वीर, मगरमच्छों की मौजूदगी से दर्जनों गांवों में खौफ!
दर्पण न्यूज 24/7 लालकुआं!
क्षेत्र के किसानों के लिए जो नाला कभी सिंचाई का अहम साधन हुआ करता था, वही नाला अब ग्रामीणों के लिए डर और खतरे की वजह बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्तमान में इस नाले में सेंचुरी पेपर मिल का वेस्ट वाटर छोड़ा जा रहा है, जिसमें रसायनों की मात्रा होने की आशंका है। नाले के दूषित पानी और उसमें बढ़ती मगरमच्छों की संख्या ने बिंदुखत्ता समेत आसपास के दर्जनों गांवों में दहशत का माहौल बना दिया है।
यह नाला बिंदुखत्ता के घोड़ानाला, राजीवनगर, पटेल नगर, मुल्तानगर, बाजपुर चौराहा, सुभाष नगर, पश्चिम राजीवनगर, शास्त्री नगर, सत्रह एकड़, गांधीनगर, हल्दूधार, जवाहर नगर और शान्तिपूरी से होते हुए किच्छा तक गुजरता है। इन इलाकों में रहने वाले लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। बरसात के दिनों में नाला उफनाने पर स्थिति और भी भयावह हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों पहले इसी नाले के पानी से खेतों की सिंचाई होती थी। अब पानी से बदबू आती है और उसका रंग भी बदला हुआ नजर आता है। लोगों को आशंका है कि इसमें रसायनों की मौजूदगी फसलों, मिट्टी और पशुओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है।
नाले में मगरमच्छों की बढ़ती मौजूदगी ने खतरे को और गंभीर बना दिया है। ग्रामीणों के अनुसार दर्जनों छोटे-बड़े मगरमच्छ अक्सर धूप सेंकने के लिए नाले से बाहर निकलकर खेतों और सड़कों पर आ जाते हैं। बरसात के मौसम में जब पानी आबादी वाले इलाकों में भर जाता है तो मगरमच्छ घरों के आसपास तक पहुंच जाते हैं। हाल ही में एक महिला पर मगरमच्छ द्वारा हमले की कोशिश की घटना सामने आई, जिससे लोगों में भय और बढ़ गया है।
वन विभाग ने पूर्व में कुछ मगरमच्छों का रेस्क्यू किया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि नाले में मगरमच्छों का प्राकृतिक प्रजनन हो रहा है, जिससे उनकी संख्या फिर बढ़ जाती है। विभाग द्वारा निगरानी बढ़ाने और आवश्यकता पड़ने पर आगे भी रेस्क्यू अभियान चलाने की बात कही जा रही है।
सेंचुरी पेपर मिल प्रबंधन का कहना है कि उनका वेस्ट वाटर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुरूप शोधन के बाद ही नाले में छोड़ा जाता है। प्रबंधन के अनुसार नाले में वन्यजीवों की मौजूदगी प्राकृतिक कारणों से है और इस समस्या के समाधान के लिए वे प्रशासन व वन विभाग के साथ समन्वय करने को तैयार हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि नाले के पानी की स्वतंत्र प्रयोगशाला जांच कराई जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। आबादी वाले क्षेत्रों में नाले को ढकने अथवा भूमिगत करने की व्यवस्था की जाए, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष रोका जा सके। इसके साथ ही नाले के किनारे सुरक्षा फेंसिंग और चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल मगरमच्छों की समस्या नहीं है, बल्कि पानी की गुणवत्ता और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। प्रशासन से मांग की जा रही है कि किसी अनहोनी से पहले स्थायी और प्रभावी समाधान किया जाए।
