








हाथियों के रास्तों के अवरोधों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अब उत्तराखंड के कॉरिडोर पर भी उठेंगे सवाल!
फसल बचाने के नाम पर वन्यजीवों का रास्ता रोकना मंजूर नहीं — छह सप्ताह में देशभर के हाथी कॉरिडोर का सर्वे कर रिपोर्ट दे केंद्र!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | प्रमोद बमेटा
नई दिल्ली/देहरादून। हाथियों की राह में इंसानी दीवार खड़ी करने वाले राज्यों के लिए सुप्रीम कोर्ट का सोमवार का आदेश बड़ा संदेश बनकर सामने आया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि फसल और आजीविका के नुकसान का हवाला देकर हाथियों की प्राकृतिक आवाजाही के रास्ते में किसी भी तरह का अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार को देशभर के एलिफेंट कॉरिडोर का नया सर्वे कर यह पता लगाने के निर्देश दिए गए हैं कि कहीं हाथियों के पारंपरिक रास्तों को बाधित तो नहीं किया गया है।
यह आदेश उत्तराखंड के लिए खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य के तराई-भाबर क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही वाले कई पारंपरिक मार्ग सड़क, आबादी, कृषि भूमि, निर्माण गतिविधियों और अन्य मानवीय हस्तक्षेपों के बीच लगातार दबाव में हैं। ऐसे में अब सवाल सिर्फ मानव-हाथी संघर्ष का नहीं, बल्कि हाथियों के सुरक्षित और निर्बाध आवागमन के लिए राज्य में मौजूद कॉरिडोर की वास्तविक स्थिति का भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने खींची साफ लकीर!
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा स्वीकार्य नहीं है। हाथियों के झुंड लंबी दूरी तय करते हैं और उनके पारंपरिक मार्गों को राज्य अपनी सुविधा के अनुसार बंद नहीं कर सकते।
अदालत ने केंद्र के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह देशभर में सर्वे कर यह पता लगाए कि एलिफेंट कॉरिडोर में कहां-कहां अवरोध हैं, उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या पहल की जा रही है।
केंद्र को छह सप्ताह के भीतर वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
उत्तराखंड में आदेश की अहमियत क्यों?
उत्तराखंड का तराई और भाबर इलाका हाथियों की आवाजाही के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। जंगलों से निकलकर हाथियों के झुंड कई बार खेतों और आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। इससे फसलों को नुकसान होता है और मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण हो गया है—क्या हाथियों के पारंपरिक रास्तों पर कहीं सड़क, निर्माण, बाड़, अतिक्रमण अथवा अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण दबाव या अवरोध पैदा हुआ है?
यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले सर्वे में तलाशा जाएगा।
फसल बर्बाद होती है तो रास्ता बंद नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि फसल के नुकसान को रोकने के लिए हाथियों के रास्ते में अवरोध खड़ा करना समाधान नहीं है। अदालत का रुख इस मायने में महत्वपूर्ण है कि मानव-हाथी संघर्ष से जूझ रहे राज्यों को अब कॉरिडोर सुरक्षित रखने और वैज्ञानिक तरीके से संघर्ष कम करने के उपायों पर ज्यादा जोर देना होगा।
यानी खेत बचाने के लिए हाथियों का रास्ता बंद करने के बजाय ऐसा तंत्र विकसित करना होगा, जिसमें किसान भी सुरक्षित रहें और वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही भी बनी रहे।
फायरबॉल और मशालों पर भी सख्ती!
अदालत ने हाथियों को भगाने के लिए फायरबॉल, मशाल या आग आधारित किसी भी तरीके के इस्तेमाल पर रोक के निर्देश दिए हैं। पीठ ने वन्यजीवों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई को लेकर भी गंभीर रुख अपनाया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि कई स्थानों पर हाथियों के झुंड को भीड़ की तरह घेरकर खदेड़ा जाता है। अदालत ने ऐसे तौर-तरीकों को रोकने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं।
अब उत्तराखंड में भी होगी असली परीक्षा!
सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने उत्तराखंड में हाथी कॉरिडोर और मानव-हाथी संघर्ष को लेकर वर्षों से उठ रहे सवालों को फिर सामने ला दिया है। अब निगाह इस बात पर होगी कि केंद्र और राज्य स्तर पर होने वाला सर्वे कागजों पर मौजूद कॉरिडोर और जमीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति में कितना अंतर उजागर करता है।
यदि किसी कॉरिडोर में निर्माण, बाड़, सड़क, अतिक्रमण या अन्य गतिविधियों से हाथियों की आवाजाही प्रभावित पाई जाती है, तो उसे लेकर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह भी देखने वाली बात होगी।
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—जंगल और वन्यजीवों के रास्ते को इंसानी सुविधा के नाम पर बंद नहीं किया जा सकता। अब उत्तराखंड में सवाल यह नहीं होगा कि हाथी गांव और खेतों में क्यों आ रहे हैं, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि आखिर उनके सदियों पुराने रास्ते कितने खुले बचे हैं?
