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शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर लगातार डाका डाल रहे निजी स्कूलों की मनमानी पर जिलाधिकारी ने कसा शिकंजा!

तीन साल में 10% से अधिक फीस बढ़ाने पर रोक, एकमुश्त वसूली नहीं चलेगी, अतिरिक्त रकम लौटाने के आदेश से अभिभावकों में खुशी की लहर।

दर्पण न्यूज 24/7

हल्द्वानी। शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर लगातार डाका डाल रहे निजी स्कूलों पर आखिरकार जिला प्रशासन ने कड़ा शिकंजा कस दिया है। जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के सख्त निर्देशों के बाद शिक्षा विभाग ने निजी विद्यालयों की फीस वसूली पर ऐसी लगाम लगाई है, जिसकी जिलेभर में जमकर सराहना हो रही है। वर्षों से मनमानी फीस वृद्धि, अलग-अलग मदों में अवैध वसूली और अभिभावकों पर एकमुश्त शुल्क जमा करने का दबाव बनाने वाले स्कूल अब प्रशासन की निगरानी में आ गए हैं।

मुख्य शिक्षा अधिकारी गोविंद राम जायसवाल द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार अब कोई भी निजी विद्यालय तीन वर्षों में अधिकतम 10 प्रतिशत से अधिक शुल्क वृद्धि नहीं कर सकेगा। इसके लिए भी अभिभावक-शिक्षक संघ (पीटीए) की स्वीकृति अनिवार्य होगी। प्रवेश शुल्क केवल वास्तविक खर्च के आधार पर लिया जाएगा और विकास शुल्क को भी न्यूनतम रखना होगा। किसी अन्य नाम से अतिरिक्त शुल्क वसूलने की अनुमति नहीं होगी।

प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी अभिभावक को एकमुश्त फीस जमा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। मासिक, त्रैमासिक, छमाही अथवा वार्षिक शुल्क जमा करने का विकल्प देना अनिवार्य होगा तथा हर भुगतान की रसीद भी देनी होगी।

सबसे अहम फैसला यह है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 में विभिन्न मदों में अभिभावकों से ली गई अतिरिक्त राशि का समायोजन जुलाई माह की फीस में किया जाएगा। यदि अतिरिक्त वसूली अधिक हुई है तो शेष राशि आगामी महीनों की फीस में समायोजित करनी होगी। सभी विद्यालयों को सात दिनों के भीतर इसका प्रमाणित विवरण शिक्षा विभाग को देना होगा।

डीएम ललित मोहन रयाल ने दो टूक कहा कि “शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” वहीं मुख्य शिक्षा अधिकारी ने चेतावनी दी है कि आदेशों की अवहेलना करने वाले विद्यालयों पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, सीबीएसई उपविधियों एवं अन्य नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। दोषी विद्यालयों पर एक लाख से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना, मान्यता समाप्त करने और एनओसी निरस्त करने जैसी कठोर कार्रवाई भी की जा सकती है।

जिला प्रशासन की इस पहल को अभिभावकों ने राहत देने वाला ऐतिहासिक निर्णय बताया है। लंबे समय से निजी स्कूलों की मनमानी से परेशान अभिभावकों का कहना है कि यदि इन आदेशों का ईमानदारी से पालन कराया गया तो शिक्षा के व्यवसायीकरण पर प्रभावी अंकुश लगेगा और बच्चों की पढ़ाई के नाम पर होने वाली अवैध वसूली पर भी रोक लगेगी।

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