इफको की नैनो तकनीक और जैविक खेती का संगम! किसान देख रहे कृषि का भविष्य, बदल रही खेती की तस्वीर!
चार दिवसीय अंतरराज्यीय फार्मर ट्रेनिंग में सात राज्यों के 51 किसान बने परिवर्तन के साक्षी!
प्रमोद बमेटा दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो, प्रयागराज।
भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां परंपरागत अनुभवों के साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीक का समन्वय किसानों की तकदीर बदलने की क्षमता रखता है। इसी परिवर्तनकारी सोच को जमीन पर उतारने के उद्देश्य से मोतीलाल नेहरू किसान प्रशिक्षण संस्थान, फूलपुर में आयोजित चार दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम के तीसरे दिन देशभर से आए किसानों ने इफको की नैनो तकनीक, जैविक खेती, प्राकृतिक कृषि और कृषि प्रसंस्करण के आधुनिक मॉडल का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया।
कोरडेट कॉपरेटिव रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं दिया जा रहा, बल्कि उन्हें उन तकनीकों और व्यवस्थाओं से भी परिचित कराया जा रहा है जो आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि की दिशा तय करेंगी।
नैनो उर्वरक: कम लागत में अधिक उत्पादन का सूत्र!
किसानों ने इफको के नैनो यूरिया और नैनो डीएपी उत्पादन संयंत्र का भ्रमण किया, जहां विशेषज्ञों ने बताया कि नैनो तकनीक आधारित उर्वरक कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हो रहे हैं। ये उर्वरक फसलों को अधिक प्रभावी पोषण प्रदान करने के साथ-साथ उर्वरक की खपत कम करते हैं, जिससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरण पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव भी कम होता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि आने वाले समय में नैनो उर्वरक कृषि को अधिक टिकाऊ, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
जैविक खेती से मिट्टी को मिलेगा नया जीवन!
भ्रमण के दौरान किसानों ने इफको की बायो-फर्टिलाइजर यूनिट का भी निरीक्षण किया। यहां उन्हें लाभकारी सूक्ष्म जीवों, जैविक उर्वरकों और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाली आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत प्रभावित हो रही है। ऐसे में जैविक एवं संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं, बल्कि भूमि की उत्पादकता को भी लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।
खेत से बाजार तक: मूल्य संवर्धन से बढ़ेगी आय!
प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू खाद्य प्रसंस्करण और शहद प्रसंस्करण इकाइयों का भ्रमण रहा। यहां किसानों को समझाया गया कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने किसानों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन के विभिन्न मॉडल समझाए। बताया गया कि यदि किसान समूह बनाकर प्रसंस्करण इकाइयों से जुड़ें तो उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम!
किसानों ने गौशाला का भ्रमण कर गोबर एवं गोमूत्र आधारित जैविक उत्पादों, वर्मीकम्पोस्ट निर्माण तथा प्राकृतिक खेती की तकनीकों को नजदीक से देखा। विशेषज्ञों ने बताया कि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग कर खेती की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह किसानों को रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने का अवसर भी प्रदान करती है।
सात राज्यों के किसान बने परिवर्तन के साक्षी!
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा सहित सात राज्यों के कुल 51 किसानों ने प्रतिभाग किया। उत्तराखंड से प्रगतिशील किसान एवं पत्रकार ईश्वरी दत्त भट्ट, धर्मानंद खोलिया, प्रमोद बमेटा तथा दया किशन खोलिया ने भी सक्रिय सहभागिता करते हुए आधुनिक कृषि तकनीकों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की।
आत्मनिर्भर और वैज्ञानिक कृषि की ओर बढ़ता भारत!
प्रशिक्षण कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि आधुनिक तकनीक, जैविक विकल्प, प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग और कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन ही भविष्य की सफल खेती का आधार है। नैनो तकनीक से लेकर प्राकृतिक खेती तक की यह यात्रा किसानों को आत्मनिर्भर, लाभकारी और टिकाऊ कृषि मॉडल की ओर अग्रसर कर रही है।
देशभर से आए किसानों का मानना है कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं करते, बल्कि कृषि के बदलते स्वरूप को समझने और नई संभावनाओं को अपनाने का आत्मविश्वास भी प्रदान करते हैं। यदि इन तकनीकों को गांव-गांव तक पहुंचाया जाए तो भारतीय कृषि न केवल उत्पादन में, बल्कि गुणवत्ता, लाभप्रदता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी विश्व के लिए उदाहरण बन सकती है।
