उत्तराखंड की राजनीति को लगा गहरा आघात, नहीं रहे अनुशासन और ईमानदारी के प्रतीक भुवन चंद्र खंडूरी!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | देहरादून
पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के निधन से उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई है। अपनी सादगी, कड़क प्रशासनिक शैली, अनुशासन और बेदाग राजनीतिक जीवन के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी ने मंगलवार को देहरादून में अंतिम सांस ली। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूरी के निधन को उत्तराखंड की राजनीति की अपूर्णीय क्षति माना जा रहा है।
एक अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे खंडूरी ने भारतीय सेना में लंबी सेवा देने के बाद सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। इंजीनियरिंग कोर में अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया था। सेना से मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और जल्द ही अपनी साफ-सुथरी छवि तथा कठोर प्रशासनिक कार्यशैली के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली।
वर्ष 1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुने गए खंडूरी कई बार संसद पहुंचे और भारतीय जनता पार्टी के मजबूत पहाड़ी चेहरे के रूप में उभरे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने देश में सड़क क्रांति की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को धरातल पर उतारने में उनका योगदान आज भी याद किया जाता है।
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2007 में जब भाजपा की सरकार बनी तो खंडूरी पहली बार मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, सख्त प्रशासन और अनुशासन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। सरकारी मशीनरी में उनकी छवि एक ऐसे मुख्यमंत्री की थी जो किसी भी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करते थे। उनकी ईमानदारी पर राजनीतिक विरोधी भी कभी उंगली नहीं उठा सके।
हालांकि उनकी कठोर कार्यशैली कई नेताओं और विधायकों को असहज भी करती रही, लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और सम्मान लगातार बना रहा। वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में वर्ष 2011 में पार्टी ने दोबारा उन पर भरोसा जताते हुए राज्य की कमान सौंपी।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कोटद्वार सीट से हार का सामना करने के बावजूद जनता के दिलों में उनके प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ। 2014 में वह पुनः गढ़वाल से सांसद चुने गए। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने बाद के वर्षों में सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।
भुवन चंद्र खंडूरी केवल एक राजनेता नहीं बल्कि राजनीति में सिद्धांत, पारदर्शिता और नैतिक मूल्यों की जीवित मिसाल थे। उनके निधन से उत्तराखंड ने अपना एक ऐसा जननेता खो दिया है जिसकी पहचान सत्ता से अधिक ईमानदारी, अनुशासन और जनसेवा से थी। उनका जाना उत्तराखंड की राजनीति और सार्वजनिक जीवन के लिए अपूरणीय क्षति माना जाएगा।
