“पर उपदेश कुशल बहुतेरे” — जनता को ऊर्जा बचत का संदेश, सरकारी परियोजना में डीजल का प्रवेश!
बिना अस्थायी विद्युत संयोजन के करोड़ों के छात्रावास निर्माण में जनरेटरों के इस्तेमाल का दावा, ऊर्जा संरक्षण पर उठे सवाल!
दर्पण न्यूज़ 24/7 | हल्दूचौड़
देश में ऊर्जा संरक्षण को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय-समय पर ऊर्जा बचाने, पेट्रोलियम उत्पादों की खपत कम करने और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की अपील करते रहे हैं। कई सांसद और विधायक भी सार्वजनिक मंचों से ईंधन बचाने का संदेश देते हुए बसों और सार्वजनिक परिवहन में सफर कर उदाहरण प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं। लेकिन हल्दूचौड़ में करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे एक सरकारी छात्रावास निर्माण को लेकर सामने आए तथ्य इन संदेशों के बीच कई असहज सवाल खड़े कर रहे हैं।
पीएम श्री अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज हल्दूचौड़ परिसर में पेयजल निर्माण निगम द्वारा निर्मित कराए जा रहे आवासीय विद्यालय छात्रावास का भवन लगभग तैयार है। लेकिन निर्माण कार्य के दौरान ऊर्जा आपूर्ति की व्यवस्था को लेकर उठे सवाल अब चर्चा का विषय बन गए हैं। जानकारी के अनुसार निर्माण कार्य के लिए कोई अस्थायी विद्युत संयोजन नहीं लिया गया था। वहीं निर्माण से जुड़े पक्षों का दावा है कि पूरा निर्माण कार्य निजी जनरेटरों के माध्यम से किया गया।
यदि यह दावा सही है तो सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की इस विशाल परियोजना में महीनों तक चले निर्माण कार्य के दौरान कितने जनरेटर लगाए गए, कितनी मात्रा में डीजल खर्च हुआ और क्या यह व्यवस्था ऊर्जा संरक्षण की सरकारी नीति की भावना के अनुरूप थी? क्षेत्र के लोगों का मानना है कि जब विद्युत विभाग से अस्थायी कनेक्शन लेने की व्यवस्था उपलब्ध थी तो ऐसे संकट के समय डीजल आधारित विकल्प को प्राथमिकता क्यों दी गई।
विशेषज्ञों के अनुसार बड़े निर्माण कार्यों में अस्थायी विद्युत संयोजन अपेक्षाकृत अधिक किफायती, सुरक्षित और ऊर्जा दक्ष विकल्प माना जाता है। इसके विपरीत लंबे समय तक जनरेटरों का उपयोग न केवल ईंधन की अधिक खपत बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहतर विकल्प नहीं माना जाता।
इस पूरे मामले में कार्यदायी संस्था की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकारी धन से संचालित परियोजनाओं में संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करना और सभी प्रक्रियाओं का नियमानुसार पालन कराना कार्यदायी संस्था की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि वास्तव में हजारों लीटर डीजल खर्च कर निर्माण कार्य कराया गया है तो यह जानना भी आवश्यक है कि इसके पीछे क्या कारण थे और क्या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया गया था।
वहीं विद्युत विभाग की भूमिका को लेकर भी चर्चा है। बिना अस्थायी संयोजन के इतने बड़े निर्माण कार्य के दौरान ऊर्जा आपूर्ति की व्यवस्था को लेकर क्या निगरानी की गई और क्या संबंधित अभिलेखों का परीक्षण किया गया, यह भी स्पष्ट होना बाकी है।
फिलहाल छात्रावास की इमारत लगभग तैयार है, लेकिन उसके निर्माण में इस्तेमाल हुई ऊर्जा का सच अब भी पूरी तरह सामने नहीं आया है। जनता जानना चाहती है कि ऊर्जा संरक्षण के संदेश केवल आम नागरिकों तक सीमित हैं या फिर सरकारी परियोजनाओं में भी उनका पालन उतनी ही गंभीरता से सुनिश्चित किया जाता है।
अब निगाहें कार्यदायी संस्था और संबंधित विभागों पर टिकी हैं। लोगों को इंतजार है कि वे इस पूरे प्रकरण पर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट कर जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब कब देते हैं।
